संपादकीय: महज रणनीतिक विराम
पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच घोषित दो सप्ताह का युद्ध विराम पहली नजर में राहत देता है, परंतु इसके भीतर अस्थिरता की गहरी परतें छिपी हैं। सवाल यह नहीं कि युद्ध रुका है, बल्कि यह है कि क्या वास्तव में शांति की कोई ठोस जमीन तैयार हुई है। सबसे पहली बाधा भरोसे की है। डोनाल्ड ट्रंप के लगातार बदलते बयानों ने वार्ता की विश्वसनीयता को कमजोर किया है।
जब एक पक्ष ‘पूर्ण विनाश’ की भाषा बोलता है और साथ ही वार्ता की भी बात करता है, तो कूटनीतिक प्रक्रिया पर स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है। ऐसे में यह मान लेना कठिन है कि अमेरिका ईरान की सभी शर्तों को स्वीकार करेगा—विशेषकर सैन्य उपस्थिति, प्रतिबंधों और परमाणु कार्यक्रम जैसे संवेदनशील मुद्दों पर। जमीनी स्थिति भी शांति के अनुकूल नहीं है। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा ईरान के अस्फहान और लबान द्वीप पर हमले इस संघर्ष के विस्तार का संकेत हैं। यदि क्षेत्रीय देश सीधे युद्ध में शामिल होते हैं, तो यह संघर्ष बहु-ध्रुवीय हो जाएगा, जिससे किसी भी युद्धविराम की प्रासंगिकता कम हो जाती है।
इसी तरह इजराइल द्वारा लेबनान में कार्रवाई और उसके जवाब में ईरान की नाराजगी तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने जैसे कदम स्थिति को और जटिल बनाते हैं। इस परिदृश्य में चीन की भूमिका निर्णायक बनती दिख रही है। ईरान द्वारा उसके कहने पर युद्धविराम स्वीकार करना इस बात का साफ संकेत है कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है। अमेरिका के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं होगा कि उसका पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र अब किसी अन्य शक्ति के हस्तक्षेप से संचालित हो। सैन्य दृष्टि से भी स्थिति अस्थिर है। ईरान के पास अभी भी पर्याप्त मिसाइल क्षमता और लांचर मौजूद हैं, जिससे वह वार्ता की मेज पर आत्मविश्वास के साथ बैठ सकता है।
दूसरी ओर, अमेरिका द्वारा 14 दिनों के बाद और भीषण हमलों की संभावित योजना का संकेत इस युद्धविराम को ‘सशर्त विराम’ बना देता है, जहां शांति असफल होते ही संघर्ष और तीव्र हो सकता है। जब तक गाजा और लेबनान में हमले जारी हैं, तब तक पूरे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की कल्पना अधूरी है। क्षेत्रीय संघर्ष एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; एक मोर्चे पर शांति और दूसरे पर युद्ध लंबे समय तक साथ नहीं चल सकते। कूटनीतिक स्तर पर भी समाधान कठिन है। न तो ईरान होर्मुज पर नियंत्रण छोड़ेगा न अमेरिका अपने सैन्य ठिकानों को हटाएगा। ईरान द्वारा परमाणु कार्यक्रम रोकना और इजराइल द्वारा स्थायी युद्ध बंदी की सहमति भी कठिन है।
भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सीधे इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ी है, इसलिए भारत को संतुलित कूटनीति के साथ-साथ शांति प्रयासों का समर्थन करना होगा। कुल मिलाकर यह दो सप्ताह का युद्धविराम ज्यादा से ज्यादा ‘रणनीतिक विराम’ प्रतीत होता है, न कि स्थायी समाधान की दिशा में निर्णायक कदम। यदि मूल मुद्दों—सुरक्षा, प्रभुत्व और विश्वास का समाधान नहीं हुआ, तो यह शांति अस्थायी ही साबित होगी और क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की आग में झुलस सकता है।
