संपादकीय : और उग्र होता युद्ध

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Published By Monis Khan
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ईरान के बुशहर परमाणु संयंत्र और उसके बाद उसके प्रमुख पेट्रोकेमिकल ठिकानों पर अमेरिकी हमलों ने पश्चिम एशिया के युद्ध को अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करा दिया है। यह अब केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि ऊर्जा, पर्यावरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा बहुआयामी संकट बन चुका है। साफ है कि अमेरिका अब ईरान की सैन्य क्षमता ही नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक रीढ़ को भी तोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है। 

यह “पूर्ण युद्ध” की स्थिति है, जहां विरोधी की संपूर्ण संरचना को निशाना बनाया जाता है। डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल की संभावित अगली चालों के संकेत स्पष्ट हैं कि रणनीतिक ठिकानों, मिसाइल बेस और ऊर्जा अवसंरचना, जिसमें विद्युत शामिल हैं, उन पर भीषण हमले। ट्रंप के 48 घंटे का अल्टीमेटम इस बात का संकेत है कि कूटनीति की जगह अब सैन्य दबाव ने ले ली है। ट्रंप की कथित “तीन सप्ताह में युद्ध समाप्त करने” की योजना और वर्तमान आक्रामकता के बीच विरोधाभास स्पष्ट है। यह अमेरिकी घरेलू राजनीति से भी जुड़ा हो सकता है, जहां वे एक निर्णायक और विजयी छवि प्रस्तुत करना चाहते हैं। 

इतिहास गवाह है कि अल्पकालिक युद्ध के लक्ष्य अक्सर दीर्घकालिक संघर्षों में बदल जाते हैं, विशेषकर जब ईरान जैसा विरोधी पक्ष, प्रतिरोध की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों रखता हो। बड़ा सवाल यह है कि जब अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने ईरान को तत्काल परमाणु खतरा नहीं माना, तब उसके परमाणु संयंत्रों पर बार-बार हमले क्यों? इसका उत्तर रणनीतिक बहानेबाजी में है, भविष्य की क्षमता को अभी ही नष्ट करना। किंतु यह कदम अत्यंत जोखिमपूर्ण है। बुशहर जैसे संयंत्र पर हमला, यदि गंभीर क्षति या रेडियोधर्मी रिसाव का कारण बनता है, तो इसका प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, कुवैत, यूएई और खाड़ी के अन्य देशों तक इसका असर पहुंच सकता है। नाभिकीय रिसाव की स्थिति में कैंसर, पर्यावरणीय विनाश और दशकों तक बने रहने वाले रेडिएशन की समस्या पैदा होती है। अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून विशेषतः जेनेवा कन्वेंशन, ऐसे संवेदनशील ठिकानों पर हमले से बचने की अपेक्षा करता है। फिर भी, इन नियमों का उल्लंघन यह दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में नैतिक सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं।

अमेरिका की “आर-पार” वाली रणनीति यह संकेत देती है कि आने वाले दिनों में संघर्ष अचानक तीव्र हो सकता है। तेज हमलों की श्रृंखला, और फिर किसी निर्णायक मोड़ पर युद्धविराम का प्रयास। किंतु ईरान जैसे देश के पूर्ण “ध्वस्त” होने की संभावना कम है, इसके बजाय एक लंबा, अस्थिर संघर्ष अधिक यथार्थपरक परिदृश्य है। भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। एक ओर, उसकी ऊर्जा निर्भरता होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है, दूसरी ओर लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। भारत को संतुलित कूटनीति, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए ठोस निकासी योजना तैयार रखनी चाहिए। यह युद्ध केवल दो देशों का नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता की परीक्षा बन चुका है। यदि परमाणु और ऊर्जा अवसंरचनाओं पर हमले जारी रहे, तो इसका प्रभाव सीमाओं से परे जाकर पूरी दुनिया को झकझोर सकता है। भारत को सजग, संतुलित और रणनीतिक रूप से सक्रिय रहना होगा।