संपादकीय: जेल नहीं बस जुर्माना

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Published By Monis Khan
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जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) विधेयक 2026 राज्यसभा से पास होने के बाद कानून बनेगा। सरकार को यकीन है कि इस प्रस्तावित कानून के आने के बाद कारोबारी माहौल और सुगम, बेहतर तथा भयमुक्त होगा क्योंकि छोटे-मोटे अपराधों से जेल की सजा हटाकर उसे जुर्माने में बदला गया है और पहली बार कम गंभीर अपराध, छोटे मोटे अपराध, अपराध की श्रेणी से ही बाहर कर दिए गए हैं। इसे तर्क संगत तथा व्यावहारिक बनाने के लिए 79 केंद्रीय कानूनों के 784 संशोधनों किए गए, जिसे संसद की मंजूरी मिल गई है। 

यह ठीक है कि सामान्य अपराध में किसी व्यवसायी को जेल में डालकर अनुत्पादक भीड़ बढाने से बेहतर है जुर्माने के तौर पर उनसे कुछ धन हासिल किया जाए, जो ज्यादा सार्थक और उत्पादक कृत्य होगा। देश की अदालतों में जो तकरीबन पांच करोड़ मामले लंबित हैं, इसमें से साढ़े करोड़ से ज्यादा मामले आपराधिक हैं। इनमें से बहुतायत संख्या अत्यंत साधारण किस्म के आपराधिक आरोपों के हैं। ऐसे में यह कानून आया तो वह अदालतों से आपराधिक मामलों का और जेल प्रशासन से कैदियों के देखरेख का बोझ हटाने में सफल हो जाएगी।

साधारण या अनजाने में किए अपराधों से संबंधित अदालत में लंबित लाखों मुकदमों का निपटारा आसानी से और त्वरित तौर पर संभव होगा तथा धन, समय, ऊर्जा, संसाधन के अपव्यय का कारण बनने वाले इन लंबित मुकदमों की संख्या भी आगे नहीं बढेगी। साधारण मामलों वाले इन खिंचते मुकदमों के चलते जनता, अदालतें, सरकार और कारोबारी तथा दूसरे वर्ग परेशान होते थे। कानून के प्रभावी होने से अदालतें बेवजह के कागज पत्र, कार्रवाइयों के बोझ से कम दबेंगी कोर्ट के कामकाज में फुर्ती आएगी। 

साधारण अपराध में जेल जाने वाला व्यक्ति देश, समाज, परिवार के लिए बोझ बन जाता है और रिहा होने के बाद भी कलंक नहीं छूटता। सो बेहतर है कि जुर्माना भरकर अथवा अदालत से बाहर एक दंड राशि चुकाकर दोनों पक्ष समझौता कर अपराध और मुकादमा मुक्त हो लें। मोदी सरकार ने लोगों रहन-सहन एवं व्यापार करने में सुगमता, सुविधा लाने के लिए पिछले दशक भर से लगभग 40 हजार कानूनी प्रावधानों को सरल बना चुकी है। इस बार की कारगुजारी को जोड़ लें तो उसने 1562 कानूनी प्रावधानों को कानून की किताब से हटाया है। 

यह सही है कि देश में प्रचलित 1536 कानूनों के 70 हजार प्रावधानों में से अधिकतर छोटे कारोबारियों के विकास में बाधा बनते हैं। ऐसे में सामान्य और कामकाज के दौरान असावधानी के चलते हो जाने वाले अपराधों के लिए जेल चले जाने का भय व्यापार के पारिस्थितिकी तंत्र और व्यापारी, निर्माता के व्यक्तिगत आत्मविश्वास के विकास में बाधा डालने वाला एक प्रमुख कारक है। सरकार का यह प्रयास उचित है कि वह व्यवस्था की अड़चनें कम करने के लिए वर्तमान की स्थिति के मद्देनजर पुराने नियमों में बदलाव करे और जो कारोबारी छोटे-छोटे अपराधों के कारण जेल की सजा और जुर्माने से डरते हैं। वे व्यवसायी और सरकारी एजेंसियां सामान्य या तकनीकी रूप से सामान्य उल्लंघनों के लिए जेल जाने की चिंता से निर्भय हो अपना काम करें।