संपादकीय:घर में घिरे ट्रंप

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Published By Monis Khan
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अमेरिकी जनता में उभरता व्यापक जन-असंतोष मात्र सत्ता से नीतिगत मतभेद ही नहीं, बल्कि शासन-शैली और संस्थागत संतुलन पर गहरे सवालों का संकेत है। अमेरिका में ‘नो किंग्स मूवमेंट’ के तहत डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के विरुद्ध जिस प्रकार देशव्यापी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि लोकतांत्रिक समाजों में जनता केवल मतदाता नहीं, बल्कि सतत निगरानी करने वाली शक्ति भी है। इन प्रदर्शनों का दायरा केवल युद्ध नीतियों तक सीमित नहीं। संघीय इमिग्रेशन कानूनों की कठोरता, बढ़ती महंगाई और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर जनता की मुखरता ने ट्रंप के लिए नया मोर्चा खोल दिया है। 

अमेरिकी जनता के एक वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई है कि सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ रहा है और कार्यपालिका, विशेषकर राष्ट्रपति, अपनी शक्तियों का विस्तार असाधारण रूप से कर रहे हैं। ट्रंप द्वारा एग्जीक्यूटिव ऑर्डर का व्यापक उपयोग, राज्यों की आपत्तियों के बावजूद नेशनल गार्ड की तैनाती और कथित राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जांच या मुकदमे चलाने के संकेत, इन सबने इस असंतोष को हवा दी है। 

आलोचकों का आरोप है कि यह प्रवृत्ति अमेरिकी लोकतंत्र की संस्थागत परंपराओं के विपरीत है। ट्रंप स्वयं को ‘राजा न होने और ‘राष्ट्रहित में निर्णायक नेतृत्व’ देने की बात भले ही कहते रहें, पर लोकतंत्र में केवल दावों से नहीं, बल्कि संस्थागत आचरण से विश्वास बनता है। व्हाइट हाउस द्वारा इन विरोध प्रदर्शनों को ‘ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी’ कहकर खारिज करना भी चिंताजनक है। यह न केवल असहमति का सामान्यीकरण है, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करने वाला दृष्टिकोण भी है। 

इतिहास बताता है कि जनमत को नज़रअंदाज़ करने की कीमत राजनीतिक रूप से चुकानी पड़ती है, विशेषकर तब, जब मिडटर्म चुनाव नजदीक हों। यदि ये प्रदर्शन व्यापक और लगातार बने रहते हैं, तो ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग पर नकारात्मक असर पड़ना तय है और इससे चुनावी परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं। तमाम शहरों में जनता का सड़कों पर उतरना यह दर्शाता है कि युद्ध की कीमत समाज को भी चुकानी पड़ती है। 

लंदन सहित यूरोप के अन्य हिस्सों में भी अमेरिका-इजराइल की नीतियों के खिलाफ आवाज उठ रही है, जो वैश्विक जनमत के बदलते स्वरूप का संकेत है। ये विरोध युद्ध को प्रत्यक्ष तो नहीं रोक सकते हैं, परंतु वे राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव अवश्य बनाते हैं। लोकतंत्रों में जनमत दीर्घकालिक नीति-निर्माण को प्रभावित करता है और यही इन आंदोलनों की वास्तविक शक्ति है। भारत के लिए इसमें महत्वपूर्ण सीख छिपी है।

 पहली, लोकतंत्र में असहमति को स्थान देना उसकी मजबूती का संकेत है, कमजोरी का नहीं। दूसरी, विदेश नीति में संतुलन न तो अंध समर्थन, न ही अनावश्यक विरोध- पारंपरिक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का आधार होना चाहिए। तीसरी, आंतरिक रूप से यह सुनिश्चित करना कि विकास, सुरक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन बना रहे। अमेरिका में उठती ये आवाजें हमें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, जवाबदेही और जनविश्वास से संचालित होता है। भारत को इस वैश्विक परिघटना से सीखते हुए अपने पहले ही सुदृढ़ लोकतांत्रिक मूल्यों को और प्रबलित करना चाहिए।