संपादकीय : अस्थायी राहत पश्चिम

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Published By Monis Khan
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एशिया में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत को आवागमन की अनुमति मिलना निःसंदेह राहत भरी खबर है। ईरान का यह निर्णय भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए तात्कालिक संकट को टालने वाला कदम है, किंतु इसे स्थायी समाधान मान लेना जल्दबाजी होगी। भारत की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है।

ऐसे में उसके लिए होर्मुज मार्ग का खुलना पेट्रोलियम आपूर्ति को स्थिर रखेगा ही उर्वरक और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा। तेल आपूर्ति बाधित होने पर परिवहन लागत बढ़ती और खाद्यान्न महंगे होते। यह निर्णय अर्थव्यवस्था के लिए ‘सांस लेने की जगह’ प्रदान करता है। 

भारत ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका या इजराइल के खिलाफ कड़ा रुख नहीं अपनाया, फिर भी ईरान ने उसे उन चुनिंदा देशों में रखा, जिन्हें मार्ग उपयोग की अनुमति दी गई। यह भारतीय कूटनीति की ‘रणनीतिक संतुलन’ नीति का परिणाम है, जहां भारत किसी एक ध्रुव में पूरी तरह शामिल हुए बिना अपने हित साधता है। साथ ही, यह ईरान की व्यावहारिक कूटनीति भी दर्शाता है, जो आर्थिक और भू-राजनीतिक यथार्थ को समझते हुए भारत जैसे बड़े बाजार और साझेदार को अलग-थलग नहीं करना चाहता। 

ऊर्जा मोर्चे पर भारत ने 60 दिनों का तेल भंडार और अतिरिक्त 60 दिनों की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है। इसके साथ वैकल्पिक स्रोतों की खोज भी जारी है। इससे तात्कालिक संकट की आशंका कम होती है, लेकिन वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और युद्ध की अनिश्चितता के चलते पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता की गारंटी नहीं दी जा सकती, खासकर राज्यों में होने वाले चुनावों के बाद। ई-20 पेट्रोल नीति ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, किंतु एथनॉल उत्पादन की वर्तमान क्षमता इस लक्ष्य को पूरी तरह समर्थन देने में अभी सक्षम नहीं दिखती।

कृषि, जल और खाद्य संतुलन को ध्यान में रखते हुए एथनॉल उत्पादन बढ़ाना एक जटिल चुनौती होगी। इसी प्रकार, गैस भंडारण और उत्पादन क्षमता में वृद्धि सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन वैश्विक एलएनजी बाजार अत्यधिक अस्थिर है। अतः घरेलू गैस आपूर्ति पूरी तरह निर्बाध रहेगी, यह मान लेना जोखिमपूर्ण होगा। खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में स्थिति अधिक गंभीर है। युद्ध के कारण उर्वरक उत्पादन में संभावित 15 प्रतिशत गिरावट और सब्सिडी बिल में 25 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि सरकार के वित्तीय संतुलन पर दबाव डालेगी। 

भारत की 20 प्रतिशत यूरिया और 33 फीसद डीएपी की आयात निर्भरता इस संकट को और गहरा करती है। दीर्घकालिक समाधान के लिए घरेलू उत्पादन, वैकल्पिक उर्वरकों और जैविक खेती को बढ़ावा देना आवश्यक होगा। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबा खिंचता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं और अधिक बाधित होंगी। ऐसे में भारत को ऊर्जा, खाद्य और राजकोषीय तीनों मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ सकता है। 

होर्मुज से मिली राहत एक अवसर है, लेकिन यह चेतावनी भी कि भारत को अपनी ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के ढांचे को और अधिक आत्मनिर्भर, विविधीकृत और लचीला बनाना होगा। सरकार को भंडारण, वैकल्पिक ऊर्जा, कूटनीतिक संतुलन और कृषि सुधारों पर समानांतर रूप से कार्य करना होगा, तभी यह अस्थायी राहत स्थायी सुरक्षा में बदल सकेगी।