संपादकीय:धमकियों का युद्ध

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Published By Monis Khan
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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब कूटनीतिक संतुलन, अंतर्राष्ट्रीय कानून और वैश्विक नैतिकता की भी कठोर परीक्षा बन चुका है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को ‘एक रात में खत्म कर देने’ की धमकी संघर्ष को एक खतरनाक मोड़ पर ले आया है। यह बयान केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति भी है, जिसका उद्देश्य विरोधी को भयभीत कर वार्ता की मेज पर लाना है। पिछले छह हफ्तों में हजारों हमलों के बावजूद यदि निर्णायक सफलता नहीं मिली, तो ‘एक रात’ में लक्ष्य प्राप्त कर लेने का ट्रंप का दावा राजनीतिक बयानबाजी है। यह संकेत है कि युद्ध अपेक्षा से अधिक लंबा और जटिल होने की दशा में, अमेरिकी नेतृत्व पर त्वरित परिणाम दिखाने का दबाव है। सबसे चिंताजनक नागरिक अवसंरचना को निशाना बनाने की खुली धमकी है। 

अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून- विशेषतः जेनेवा कन्वेंशन स्पष्ट रूप से नागरिकों और उनके बुनियादी ढांचे को युद्ध से अलग रखने की अपेक्षा करता है। पॉवर प्लांट, जल आपूर्ति और परिवहन नेटवर्क पर हमले न केवल मानवीय संकट को जन्म देते हैं, बल्कि उन्हें युद्ध अपराध की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। यदि किसी देश की रणनीति नागरिकों पर दबाव बनाकर सरकार को झुकाने की हो, तो यह आधुनिक युद्ध के स्वीकृत सिद्धांतों के विरुद्ध है। ऐसे में ट्रंप का यह कहना कि वे ‘युद्ध अपराध’ के सवाल को लेकर चिंतित नहीं हैं, वैश्विक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत और अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था को चुनौती है। 

सवाल उठता है कि क्या वैश्विक संस्थाएं, जैसे संयुक्त राष्ट्र ऐसी स्थिति में प्रभावी हस्तक्षेप कर सकती है? यथार्थ यह है कि महाशक्तियों के खिलाफ इन संस्थाओं की क्षमता सीमित होती है। राजनीतिक हित, वीटो शक्ति और भू-राजनीतिक समीकरण अक्सर न्यायिक कार्रवाई को बाधित कर देते हैं। संघर्ष के लगातार बढ़ते दायरे के दौरान पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, किंतु ईरान का तीव्र प्रतिकार और अमेरिका की आक्रामक रणनीति इसकी त्वरित सफलता की संभावना सीमित करती है। 

यह संघर्ष अब प्रतिष्ठा और शक्ति संतुलन का प्रश्न बन चुका है, समझौता करना दोनों पक्षों के लिए राजनीतिक रूप से कठिन है। ऐसे समय में भारत की भूमिका पर भी प्रश्न उठते हैं। भारत के ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों सभी से महत्वपूर्ण संबंध हैं। फिर भी, इस संकट में भारत अपेक्षाकृत शांत दिखाई देता है। यह रणनीतिक संयम का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अब जब स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी है, भारत को सक्रिय कूटनीतिक पहल पर विचार करना चाहिए। भारत के लिए प्राथमिकताएं स्पष्ट होनी चाहिए।

 ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता। इसके साथ ही, भारत एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत कर सकता है। यह संघर्ष मात्र सैन्य शक्ति से सुलझता नहीं दीख रहा। धमकियों और विनाश की भाषा अल्पकालिक लाभ भले दे, पर दीर्घकाल में यह वैश्विक अस्थिरता बढ़ाएगी। आज आवश्यकता है, संतुलित नेतृत्व, अंतर्राष्ट्रीय कानून के सम्मान और वास्तविक कूटनीति की, अन्यथा यह युद्ध एक ऐसे दुष्चक्र में फंस सकता है, जिससे निकलना कठिन हो जाएगा।

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