UP में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति क्यों ले रहे हैं प्रशासनिक अधिकारी, बढ़ती प्रवृत्ति ने बढ़ाई सरकार की चिंता
लखनऊः उत्तर प्रदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। हाल के महीनों में कई अफसरों ने समय से पहले सेवा छोड़ने का विकल्प चुना है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा का विषय बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वीआरएस लेने के पीछे कई कारण सामने आ रहे हैं। इनमें कार्य का अत्यधिक दबाव, प्रशासनिक चुनौतियां और निजी कारण प्रमुख हैं।
कई अधिकारी बेहतर अवसरों और निजी क्षेत्र में करियर बनाने के लिए भी यह कदम उठा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ अधिकारी स्वास्थ्य कारणों और पारिवारिक जरूरतों के चलते भी समय से पहले सेवानिवृत्ति ले रहे हैं। वहीं, कुछ मामलों में नौकरी के बढ़ते तनाव और सीमित संसाधनों के बीच काम करने की परिस्थितियां भी बड़ा कारण बन रही हैं। हाल के महीनों में केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। अधिकारियों का मानना है कि केंद्र में काम करने से बेहतर समन्वय और अनुभव मिलता है। साथ ही करियर विकास के अवसर भी ज्यादा होते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में अधिकारियों का वीआरएस लेना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। पहले से ही अधिकारियों की कमी झेल रहे राज्य में यह स्थिति कामकाज को प्रभावित कर सकती है। सूत्रों के अनुसार, कई जिलों में प्रशासनिक अधिकारियों की कमी (लगभग 16 प्रतिशत तक) पहले से ही बनी हुई है। ऐसे में अनुभवी अधिकारियों का सेवा छोड़ना शासन-प्रशासन के लिए चुनौती बन सकता है। कुछ अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कार्य का दबाव बढ़ा है और कामकाजी माहौल भी काफी चुनौतीपूर्ण हुआ है। यही वजह है कि कई अधिकारी वीआरएस को बेहतर विकल्प मान रहे हैं।
राज्य के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बताया कि कुल मिलाकर उप्र में वीआरएस लेने की बढ़ती प्रवृत्ति प्रशासनिक तंत्र के लिए एक गंभीर संकेत है। जिस पर सरकार और नीति-निर्माताओं को ध्यान देने की जरूरत है। इतनी बड़ी सेवा में शामिल होने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन सेवा में शामिल होने के बाद जिस तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं वो वीआरएस के लिए मजबूर कर रही हैं।
उन्होंने कहा, " देखिए नए अधिकारियों में धैर्य की कमी भी है । वीआरएस जैसा क़दम उठाने से पहले थोड़ा सोच विचार करना चाहिए। वैसे सरकार को भी एक तंत्र बनाना चाहिए जिससे नए बच्चों को परामर्श सेवा मिल सके। अब आईएएस रिंकू सिंह के मामले की बात करें तो वरिष्ठ अधिकारियों को उनके साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिएऔर उन्हें मौक़ा देना चाहिए था। नए बच्चों के लिए मेंटर प्रणाली विकसित करना चाहिए, ताकि आने वाले समय में इस तरह के मामलों से निपटा जा सके।"
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पिछले नौ सालों में 13 अधिकारियों ने वीआरएस लिया है। इनमें प्रमुख रूप से रविंद्र कुमार, रजनीश चंद्र, रिंकू सिंह, अनामिका सिंह, अमोद कुमार, रेणुका कुमार, जूथिका पाटणकर, विकास गोठलवाल, रिग्जिन सैम्फिल, विद्या भूषण, राकेश वर्मा, रविंद्र पाल सिंह, अभिषेक सिंह, जी. श्रीनिवासुलु शामिल हैं।
हालांकि इनमें से अधिकांश अधिकारियों ने व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है, लेकिन प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा का विषय है। प्रशासनिक सेवा के प्रति मोहभंग और निजी क्षेत्र में बेहतर अवसरों को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
