स्पेगेटी की फसल से फर्जी खबरों तक: अप्रैल फूल के मजाकों का सुनहरा दौर अब क्यों खत्म हो रहा है?
ब्रिस्बेन (द कन्वरसेशन): 1 अप्रैल जो पहले अप्रैल फूल डे के नाम से फेमस था। जहां पहले लोग एक दूसरे को परेशान करते थे। एक दूसरे की टांग खीचते थे वो समय बस अब खो गया है। सदियों पुरानी परंपरा, जो लोगों को हल्की-फुल्की शरारतें करने की अनुमति देता है। कुछ मजाक दिल को छू लेते हैं और हंसी का खजाना बन जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जो दूसरों को ठेस पहुंचा सकते हैं या भ्रम फैला सकते हैं। लेकिन आज के डिजिटल युग में ये शरारतें अक्सर उल्टी पड़ रही हैं।
मजाक की पुरानी शुरुआत
इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा 16वीं शताब्दी में फ्रांस से शुरू हुई। जब जूलियन कैलेंडर की जगह ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू हुआ, तो नया साल 1 जनवरी को मनाया जाने लगा। जो लोग पुराने कैलेंडर के अनुसार 1 अप्रैल को नया साल मनाते रहे, उन्हें 'अप्रैल फूल' कहकर चिढ़ाया जाने लगा।
उस समय मजाक साधारण होते थे, किसी को 'बाएं हाथ का पेचकस', 'कबूतर का दूध' या 'भाप वाली बाल्टी' लाने भेजना। ये चीजें असल में होती ही नहीं थीं। धीरे-धीरे मजाक और चतुर तथा बड़े पैमाने के हो गए।
मीडिया के दौर में क्लासिक मजाक
20वीं सदी में टीवी और रेडियो के आने के साथ अप्रैल फूल मजाक नई ऊंचाई पर पहुंचे।
सबसे मशहूर उदाहरण ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (BBC) का 1957 का 'पैनोरमा' कार्यक्रम है। इसमें दिखाया गया कि स्विट्जरलैंड के किसान पेड़ों से स्पेगेटी की फसल तोड़ रहे हैं। लाखों दर्शक इस रिपोर्ट को देखकर हैरान रह गए और कई लोगों ने स्पेगेटी के पेड़ उगाने के तरीके पूछे।
ऑस्ट्रेलिया में भी ABC ने इस परंपरा को अपनाया। 1970 के आसपास 'दिस डे टुनाइट' कार्यक्रम में 'डायल-ओ-फिश' नाम की काल्पनिक मशीन दिखाई गई, जो कोई भी मछली पकड़ने में मदद करती थी। एक और मजाक में यह खबर फैलाई गई कि सिडनी ओपेरा हाउस समुद्र में डूब रहा है, जिसमें गोताखोरों के फुटेज भी शामिल थे। 1975 में तो 'मैट्रिक टाइम' का मजाक किया गया। जिसमें दावा किया गया कि अब एक मिनट में 100 सेकंड और एक दिन में सिर्फ 20 घंटे होंगे।
ये मजाक हानिरहित थे। सच्चाई जल्दी सामने आ जाती थी और ज्यादातर लोग हंसकर रह जाते थे।
डिजिटल युग में बदलाव
इंटरनेट और सोशल मीडिया के आने के बाद सब कुछ बदल गया। आज हर कोई मोबाइल से खबर बना सकता है और तुरंत लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। फर्जी खबरें, डीपफेक वीडियो और गलत सूचनाएं हर तरफ फैली हुई हैं।
ऐसे में अप्रैल फूल का मजाक अक्सर गलत समझ लिया जाता है। पिछले साल ब्रिटिश टीवी प्रस्तोता ने गर्भवती होने का झूठा दावा किया, जिससे कई दंपतियों को जो संतान के लिए संघर्ष कर रहे थे, ठेस पहुंची। उसी दिन क्वींसलैंड के एक नेता ने मजाक में ब्रिस्बेन शहर द्वारा पास के इलाके को अपने में मिलाने की खबर फैलाई, जिस पर लोगों ने गुस्सा जताया।
क्यों कम हो गए मजाक?
आज की दुनिया में लोग ज्यादा जागरूक और संवेदनशील हो गए हैं। असमानता, भ्रष्टाचार और गलत सूचनाओं से भरी दुनिया में वे सत्ता या प्रभावशाली संस्थाओं से आने वाले मजाक को आसानी से बर्दाश्त नहीं करते।
सोशल मीडिया पर ध्यान आकर्षित करने की होड़ में संदेह बढ़ गया है। मीडिया संस्थान भी अब फर्जी खबरों के युग में और विश्वास खोने से डरते हैं। इसलिए अप्रैल फूल के पारंपरिक बड़े मजाक अब कम होते जा रहे हैं।
हल्के-फुल्के और सुरक्षित शरारतें अभी भी की जा सकती हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर धोखा देने वाले मजाक अब जोखिम भरे लगते हैं।
अप्रैल फूल दिवस अब भी मनाया जाता है, लेकिन उसकी मासूमियत और आनंद का पुराना दौर शायद हमेशा के लिए बदल गया है।
