नीतीश के भरोसे की विरासत संभाल पाएंगे ‘सम्राट’!
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब सम्राट चौधरी के कंधों पर है। सवाल यह है कि क्या वह नीतीश कुमार की उस लंबी और गहरी छाया से बाहर निकल पाएंगे?
बिहार की राजनीति में सत्ता का शिखर छूना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है, उस शिखर पर टिके रहकर अपनी सर्वमान्यता सिद्ध करना। सम्राट चौधरी का बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में उदय राज्य के सियासी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात माना जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति का मुख्यमंत्री बनना नहीं है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी का बिहार में उस ‘बड़े भाई’ की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता दशकों से कर रहे थे। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब सम्राट चौधरी के कंधों पर है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह नीतीश कुमार की उस लंबी और गहरी छाया से बाहर निकल पाएंगे, जिसने पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति को परिभाषित किया है? यही वह कसौटी है, जिस पर अब सम्राट चौधरी को परखा जाएगा।
सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उनके पिता शकुनि चौधरी की विरासत और उनके स्वयं के आक्रामक संघर्ष, दशकों की राजनीतिक यात्रा, रणनीतिक धैर्य और समयानुकूल निर्णयों का परिणाम है। 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में जन्मे सम्राट ने बहुत कम उम्र में ही सत्ता का स्वाद चख लिया था। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने से लेकर आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर वैचारिक बदलावों और रणनीतिक फैसलों से भरा रहा है।
राजद और जदयू जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ काम करने के बाद 2017 में भाजपा का दामन थामना उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने उनमें एक ऐसे पिछड़ा नेतृत्व (ओबीसी) को देखा, जो न केवल संगठन में जान फूंक सकता था, बल्कि राजद के ‘माई’ (एमवाई) समीकरण के सामने एनडीए के ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूती दे सकता था। विशेषकर कुशवाहा समुदाय से आने के कारण सम्राट चौधरी भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन का सबसे सटीक मोहरा साबित हुए। भाजपा ने उन्हें न केवल स्वीकार किया, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद देकर उनकी नेतृत्व क्षमता पर भरोसा भी जताया। यही भरोसा आज उन्हें मुख्यमंत्री पद तक ले आया है।
मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की नियुक्ति के साथ ही बिहार की राजनीति में एक दुर्लभ संयोग भी जुड़ा है। जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने हैं, जिन्होंने पहले उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और बाद में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। यह उपलब्धि उनके कद को तो बढ़ाती है, लेकिन इसके साथ आने वाली अपेक्षाएं उनके लिए हिमालयी चुनौतियों जैसी हैं। नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वह बिहार के लिए एक ‘इंस्टीट्यूशन’ बन चुके थे। उनके 20 वर्षों के शासनकाल ने राज्य में सुशासन की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसमें महिला सुरक्षा, सड़कें, बिजली और शराबबंदी जैसे मुद्दे हर घर से जुड़े थे। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे स्वयं को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में पेश करते हैं या एक ऐसी नई पहचान गढ़ते हैं, जो नीतीश के ‘विकास’ और भाजपा की ‘वैचारिक प्रखरता’ का संगम हो।
अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य नेता बनना सम्राट चौधरी के लिए रातों-रात संभव नहीं होगा। नीतीश कुमार की स्वीकार्यता समाज के हर वर्ग, चाहे वह महादलित हो, अति पिछड़ा हो या आधी आबादी (महिलाएं) हो, में गहराई तक थी। सम्राट चौधरी के पास फिलहाल एक मजबूत सांगठनिक ढांचा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का आशीर्वाद है, लेकिन उन्हें अपनी ‘आक्रामक छवि’ को अब ‘प्रशासकीय संयम’ में बदलना होगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अब उनके हर फैसले की तुलना नीतीश कुमार के मानकों से की जाएगी। क्या वह उसी सहजता से महादलितों और अति पिछड़ों के हितों की रक्षा कर पाएंगे? क्या वह शराबबंदी जैसी पेचीदा नीतियों को लेकर जनता के बीच अपना स्पष्ट नजरिया रख पाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर उनके कार्यकाल के शुरुआती सौ दिन ही तय करेंगे।
चुनौतियां केवल बाहर ही नहीं, गठबंधन के भीतर भी हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद जदयू के भविष्य और निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में प्रवेश ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। जदयू के भीतर इस बदलाव को लेकर एक दबी हुई छटपटाहट है। सम्राट चौधरी को यह सुनिश्चित करना होगा कि गठबंधन के सहयोगी दल खुद को उपेक्षित महसूस न करें। साथ ही, उन्हें भाजपा के भीतर भी उन वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेना होगा, जो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह गए। सम्राट चौधरी पर उनके पुराने विवादों, जैसे कम उम्र में मंत्री पद से हटाए जाने की घटना और उनके शैक्षणिक पहलुओं को लेकर विपक्ष हमलावर रहेगा। एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पेशेवर छवि और शुचिता पर उठने वाले सवालों का सामना उन्हें अपनी कार्यशैली से ही करना होगा।
बिहार में 2025 का जनादेश एक तरह से ‘फेयरवेल मैंडेट’ जैसा रहा है, जहां जनता बदलाव की मानसिक तैयारी कर चुकी थी। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी ताकत उनका ओबीसी समुदाय से होना और भाजपा आलाकमान का पूर्ण समर्थन है, लेकिन उनकी राह का सबसे बड़ा कांटा ‘नीतीश कुमार का औरा’ है। भाजपा ने अब तक बिहार में नीतीश कुमार के साये में राजनीति की है, अब उसे अपनी स्वतंत्र इमारत खड़ी करनी है, जिसकी नींव सम्राट चौधरी को रखनी है। यह सफर कांटों भरा है, क्योंकि उन्हें न केवल विकास की रफ्तार बनाए रखनी है, बल्कि बिहार की उस जटिल सामाजिक संरचना को भी साधे रखना है, जहां जाति की राजनीति कभी खत्म नहीं होती।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
