वैश्विक स्तर पर रणनीतिक धातु बनती चांदी
कभी गरीब का 'सोना' कही जाने वाली चांदी ने सिर्फ पिछले 12 महीनों में करीब 180 फीसदी की जबरदस्त छलांग लगाकर उद्योग निवेशकों और नीति निर्माताओं तीनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।
बीते एक साल में अगर किसी धातु ने सबसे ज्यादा चौंकाया है, तो वह चांदी है। कभी गरीब का 'सोना' कही जाने वाली चांदी ने सिर्फ पिछले 12 महीनों में करीब 180 फीसदी की जबरदस्त छलांग लगाकर उद्योग निवेशकों और नीति निर्माताओं तीनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और सोलर पैनलों में बढ़ते उपयोग ने चांदी को भविष्य की रणनीतिक धातु के रूप में स्थापित कर दिया है।
इसकी तेज़ी में मांग एवं आपूर्ति (डिमांड-सप्लाई) का अंतर (गैप) प्रमुख वजह है ही साथ ही जियो-पॉलिटिक्स भी बड़ी भूमिका निभा रही है। वहीं दूसरी तरफ, दुनिया में चांदी के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश चीन द्वारा इस साल इसके निर्यात पर लगे अनेक प्रतिबंधों के चलते माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में भी चांदी की चमक बरकरार रहेगी। वैसे चांदी में यह बढ़त केवल हालिया नहीं है, बीते 45 सालों में इसके दामों में करीब 88 गुना तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।
वस्तुतः पहले चांदी का ज्यादातर इस्तेमाल केवल आभूषणों व बर्तनों इत्यादि तक ही सीमित था, लेकिन अब जैसे-जैसे ग्रीन एवं क्लीन एनर्जी की तरफ देश आगे बढ़ रहा है, इससे संबंधित उद्योगों जैसे इलेक्ट्रिक कारों की बैटरियों और सोलर पॉवर के पैनल्स में चांदी की खपत तेजी से बढ़ रही है। यह चांदी की मांग और इसके फलस्वरूप कीमतों की वृद्धि में सबसे मजबूत कारक (फैक्टर) बन गया है। एक अध्ययन के अनुसार ग्रीन एवं क्लीन एनर्जी तथा इसके अन्य उपकरणों में 59 फीसदी तक चांदी का उपयोग होने लगा है।
चांदी की खनन गतिविधियों में बीते दस सालों के दौरान गिरावट देखी गई है। 'वर्ल्ड सिल्वर सर्वे' की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2015 में चांदी का वैश्विक उत्पादन 89 करोड़ आउंस था, जो कि 2024 में गिरकर 82 करोड़ आउंस रह गया। यानी कि इसके उत्पादन में 8.6 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि इसी अवधि में मांग में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। मांग एवं आपूर्ति में यह अंतर (गैप) भी कीमतों को बढ़ा रहा है। 20 करोड़ आउंस (लगभग 6300 टन) उत्पादन के साथ मेक्सिको चांदी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
बाजार के विशेषज्ञों अथवा निवेशकों ने भी समझ लिया है कि चांदी की पर्याप्त आपूर्ति नहीं है, इसलिए निवेशकों ने भी इसमें निवेश करना शुरू कर दिया है। इसके अतिरिक्त सेंट्रल बैंकों की नजर भी अब चांदी पर टिक गई है और उन्हें यह प्रतीत होता दिखाई दे रहा है कि वे अपने रिज़र्व में चांदी भी रख सकते हैं। इससे बाजार में चांदी की और भी अतिरिक्त मांग बढ़ने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में चांदी पर किए गए निवेश में 150 से 180 फीसदी तक का रिटर्न मिला है।
चांदी के दाम बढ़ने के पीछे भू-राजनीतिक वजहें भी हैं। ट्रंप कैंप का मानना है कि भविष्य की जंग तेल नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी और मेटल्स पर लड़ी जाएगी। इसी के चलते अमेरिका ने हाल ही में चांदी और तांबे को 'रेयर मेटल' (दुर्लभ धातुओं) की श्रेणी में डाल दिया है। इसके मद्देनज़र चीन ने भी चांदी के निर्यात पर सख्ती करनी शुरू कर दी है। इससे भी चांदी की कीमतों पर असर पड़ा है। एक रिपोर्ट के अनुसार चीन की निर्यात संबंधी सख्ती की वजह से वैश्विक स्तर पर चांदी की आपूर्ति 60 फीसदी तक घट सकती है।
वस्तुतः चांदी की मांग को पूरा करने में दो बड़ी तकनीकी समस्याएं हैं। पहला चांदी का लगभग 70-80 फीसदी उत्पादन अन्य धातुओं जैसे लेड, जिंक कॉपर या सोने की खदानों से 'बाय-प्रोडक्ट' के रूप में होता है। जब कोई धातु बाय-प्रोडक्ट होती है, तो उसका उत्पादन केवल उसकी अपनी मांग के हिसाब से नहीं बढ़ाया जा सकता है। दुनिया में बहुत कम खदानें ऐसी हैं जो केवल चांदी निकालती हैं।
दूसरा, चांदी का बड़ा हिस्सा सोलर पैनल, सेमीकंडक्टर और मेडिकल उपकरणों अथवा डिवाइसेस में इस्तेमाल किया जाता है। सोने के उलट इसका अधिकांश हिस्सा इन उत्पादों में स्थाई रूप से खप जाता है। साथ ही इसकी 'रिसाइक्लिंग' करना आर्थिक रूप से महंगा होता है। इसी वजह से यह एक तरह से बाजार से स्थाई रूप से बाहर निकल जाती है। यानी कि हर बार प्रोडक्ट में इस्तेमाल के लिए नई चांदी की जरूरत पड़ती है।
फोटोवोल्टिक सोलर पैनलों पर भी सिल्वर पेस्ट का उपयोग किया जाता है। गौरतलब है कि चांदी में सूर्य की रोशनी से उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को बेहद कम हानि के साथ प्रवाहित करने की क्षमता होती है। एक सोलर पैनल में 15 से 20 ग्राम चांदी लगती है। वहीं विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में 2030 तक सोलर क्षमता के 170 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है।
वस्तुतः एक ईवी में औसतन 25 ग्राम तक चांदी लगती है। यह चांदी बटेरियों, वायरिंग पावर, इलेक्ट्रॉनिक्स कंट्रोल यूनिट्स और चार्जिंग स्टेशनों में इस्तेमाल होती है। ईवी के चलन के साथ ही चांदी की भी मांग बढ़ती जा रही है। अमेरिका में ही 2030 तक 2.8 करोड़ ईवी चार्जिंग पोर्ट्स लगाने की योजना है, जिनमें चांदी की बड़ी खपत होगी। (यह लेखक के निजी विचार हैं।)
