अक्षय तृतीया : बिना मुहूर्त के शुभ कार्य करने की तिथि
पं. मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य/ अक्षय तृतीया वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस दिन शुभ कार्य को करने के लिए पंचांग व मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती। यह दिन अपने आप में ही एक शुभ दिन माना गया है। इस दिन कोई भी कार्य करना चाहे जैसे - व्यापार, विवाह, गृह प्रवेश, कोई भी नया वाहन खरीदना व सोने-चांदी की वस्तुएं खरीदना इस दिन शुभ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों ही अपनी उच्च राशि में स्थित होते हैं और शुभ परिणाम देते हैं।
इन दोनों ग्रहों की सम्मिलित कृपा का फल अक्षय होता है। अक्षय तृतीया पर मूल्यवान वस्तुओं की खरीदारी और दान-पुण्य के कार्य भी शुभ माने गए हैं। पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 19 अप्रैल, रविवार के दिन सुबह 10 बजकर 50 मिनट तक व्याप्त रहेगी। इसके उपरांत तृतीया तिथि आरंभ हो जाएगी। 20 अप्रैल, सोमवार के दिन सुबह 7 बजकर 20 मिनट तक तृतीया तिथि रहेगी। उदया तिथि की गणना के अनुसार, 20 अप्रैल को तृतीया तिथि मान्य रहेगी लेकिन फिर भी अक्षय तृतीया का पर्व 19 अप्रैल, रविवार को मनाना ही शास्त्र सम्मत रहेगा।
अक्षय तृतीया का महत्व
ऐसी मान्यताएं हैं कि अक्षय तृतीया पर सोना-चांदी खरीदने से जातक का भाग्योदय होता है। इसके अलावा, पवित्र नदियों में स्नान, दान, ब्राह्मण भोज, कर्म, यज्ञ और ईश्वर की उपासना जैसे उत्तम कार्य इस तिथि पर अक्षय फलदायी माने गए हैं। धार्मिक मान्यता अनुसार, इस दिन शुरू किया गया कोई भी कार्य आसानी से संपन्न हो जाता है।
क्यों खास है अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया को कई कारणों से साल का सबसे शुभ दिन माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया से ही हुई थी। भगवान विष्णु ने नर नारायण का अवतार भी इसी दिन लिया था। भगवान परशुराम का जन्म भी अक्षय तृतीया पर हुआ था। इस शुभ तिथि से ही भगवान गणेश जी ने महाभारत का काव्य लिखना शुरू किया था। इतना ही नहीं, अक्षय तृतीया से ही बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं और केवल इसी दिन वृंदावन में भगवान बांके-बिहारी जी के चरणों के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि इसी दिन विष्णु जी के चरणों से मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को अखा तीज के रूप में भी मनाया जाता है। कुछ लोग इसे अक्षय तीज भी कहते हैं।
अक्षय तृतीया को वसंत का अंत और ग्रीष्म ऋ तु का आरंभ माना जाता है। इसलिए इस दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, सकोरे, पंखे खड़ाऊं, छाता, सत्तू, तरबूज ककड़ी आदि गर्मी में लाभकारी वस्तुओं का दान किया जाता है।
अक्षय का अर्थ है, जो कभी क्षय न हो यानी जो सर्वदा अक्षुण्ण रहे। इस दिन किए हुए सभी शुभ कार्य हमेशा के लिए अक्षय हो जाते हैं अर्थात् जो कभी नष्ट न हो। एक कहावत भी है कि जो देता है वही पाता है अर्थात् साफ दिल व निःस्वार्थ भाव से जो हम दूसरों को देते हैं, वहीं हमें किसी न किसी रूप में कई गुना होकर पुनः मिलता है, इसलिए शास्त्रों में दान-पुण्य का बड़ा महत्व बताया गया है।
अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। दान देने से मन में परोपकार की भावना का उदय होता है तथा आसक्ति और लोभ का दमन होता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के पूजन की परंपरा है। नैवेद्य में जौ का सत्तू, ककड़ी, और चने की दाल अर्पित किया जाता है। इस दिन सत्तू आवश्य खाने तथा नई वस्तु और आभूषण पहनने की परंपरा है। अक्षय तृतीया आशा, समृद्धि और सकारात्मकता का त्योहार है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि अच्छे कर्म, चाहे वे कितने भी छोटे क्यों न हों, जीवन भर के लिए आशीर्वाद बन सकते हैं। चाहे आप इसे धार्मिक अनुष्ठानों, दान-पुण्य या साधारण प्रार्थना के साथ मनाएं, इसका सार एक ही है। यह इस बात का स्मरण दिलाता है कि समृद्धि केवल धन-दौलत से ही नहीं, बल्कि दया, आस्था और खुशी से भी जुड़ी होती है। शायद यही ‘अक्षय’ का सच्चा अर्थ है—वह चीज जो कभी समाप्त नहीं होती।
