अंतस : धर्म, शौर्य और तप के आदर्श भगवान परशुराम
गौरीशंकर वैश्य विनम्र/ भारतीय सनातन परंपरा में भगवान परशुराम का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं और ऐसे एकमात्र चिरंजीवी हैं। भगवान परशुराम का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रंथों में किया गया है। उनका व्यक्तित्व तप, शौर्य, न्याय और सामाजिक संतुलन का प्रतीक है। उनका जीवन केवल युद्धकथा नहीं, अपितु अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, मर्यादा की स्थापना और धर्म की पुनर्स्थापना का प्रेरक इतिहास है। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाए गए। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी संतानों में से एक थे। वे सदैव अपने गुरुजन और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते थे।
भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ। उनका नाम ‘राम’ था, परंतु हाथ में परशु (कुल्हाड़ी) धारण करने के कारण वे ‘परशुराम’ कहलाए। उनका जन्म त्रेतायुग में हिंदू कैलेंडर के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षय तृतीया) को माना जाता है, (जो इस वर्ष 19 अप्रैल को है)। बाल्यकाल से ही वे विलक्षण प्रतिभा, कठोर अनुशासन और अद्भुत तेज से युक्त थे। गुरु दत्तात्रेय और महादेव शिव से उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्रों तथा युद्धविद्या का ज्ञान प्राप्त हुआ। शिव से प्राप्त दिव्य परशु उनके जीवन का प्रमुख प्रतीक बन गया।
श्रीमद्भागवत में दृष्टांत है कि गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करते देख, हवन हेतु जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गईं और कुछ देर वहीं रुक गईं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्रि ने अपनी पत्नी के आर्य-मर्यादा विरोधी आचरण करने के दंडस्वरूप पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी। अन्य सभी भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पितृभक्त परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का वध कर दिया। उन्हें बचाने हेतु आए अपने समस्त भाइयों का भी वध कर दिया।
उनके इस कार्य से प्रसन्न होकर पिता जमदग्नि ने जब उनसे वर मांगने के लिए कहा। तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने संबंधी स्मृति नष्ट हो जाने का वर मांगा। परशुराम का काल ऐसा समय था, जब क्षत्रिय वर्ग के कुछ राजा शक्ति, वैभव और सत्ता के मद में अन्याय, अत्याचार और अधर्म की ओर प्रवृत्त हो गए थे। राज्य सत्ता का दुरुपयोग बढ़ने लगा था। राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) का उदाहरण इतिहास में विशेष रूप से मिलता है, जिसने महर्षि जमदग्नि के आश्रम में अत्याचार किया और अंततः उनकी हत्या कर दी। यह घटना परशुराम के जीवन में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।
पिता की हत्या से व्यथित होकर परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वे धरती से अधर्मी क्षत्रियों का उन्मूलन करेंगे। उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का संकल्प पूरा किया। यह कथन केवल रक्तपात का नहीं, अपितु सत्ता के दुरुपयोग के विरुद्ध चेतावनी और सामाजिक संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। उन्होंने अश्वमेध महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दानकर दी। केवल इतना ही नहीं। उन्होंने देवराज इंद्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिए और सागर द्वारा छोड़े गए भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर तपस्या में लीन हो गए।
भगवान परशुराम का पराक्रम अद्वितीय था। उनका शौर्य केवल बाहुबल तक सीमित नहीं था, अपितु उसमें नैतिक साहस और न्यायबोध निहित था। परशुराम ने यह सिद्ध किया कि शक्ति का प्रयोग तभी सार्थक है, जब वह धर्म के संरक्षण हेतु हो। महाभारत काल में भी परशुराम का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वे भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं के गुरु रहे। भीष्म के साथ उनका युद्ध परशुराम के अदम्य शौर्य का परिचायक है। यद्यपि यह युद्ध किसी की पराजय के लिए नहीं, अपितु गुरु-शिष्य और धर्म-प्रतिष्ठा की परीक्षा के रूप में देखा जाता है।
परशुराम केवल योद्धा ही नहीं, अपितु महान तपस्वी और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों वर्गों को उनके कर्तव्यों का बोध कराया। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि जन्म से नहीं, कर्म से व्यक्ति की पहचान होती है। केरल की भूमि के निर्माण की कथा भी परशुराम से जुड़ी है। मान्यता है कि उन्होंने समुद्र को पीछे हटाकर नई भूमि का निर्माण किया और वहां धर्म, शिक्षा तथा संस्कृति की स्थापना की। इस कारण केरल में आज भी परशुराम को ‘भूमि के जनक’ के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। भगवान परशुराम का जीवन आज के युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है। वे सिखाते हैं कि अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्चा धर्म है। साथ ही, उनका तपस्वी स्वरूप यह भी बताता है कि शक्ति के साथ संयम और आत्मसंयम अनिवार्य है।
परशुराम का व्यक्तित्व यह संतुलन स्थापित करता है कि जब संवाद और शांति विफल हो जाएं, तब धर्म की रक्षा हेतु शौर्य आवश्यक हो जाता है, किंतु विजय के पश्चात वैराग्य और तपस्या ही श्रेष्ठ मार्ग है। भगवान परशुराम भारतीय संस्कृति में धर्म, शौर्य और तप का अनुपम आदर्श हैं। वे ऐसे योद्धा-संत हैं, जिनका जीवन अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और आत्मिक उत्थान दोनों का समन्वय प्रस्तुत करता है। उनका इतिहास हमें यह प्रेरणा देता है कि समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए साहस, नैतिकता और आत्मसंयम तीनों का समान महत्व है। परशुराम केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं, अपितु युगों-युगों तक मार्गदर्शन देने वाला जीवंत आदर्श है।
