बोध कथा: मानसिक संतोष में खुशी
एक बार की बात है, एक बहुत ही अमीर व्यापारी अपने विशाल महल की खिड़की पर खड़ा था। वह बहुत चिंतित और उदास था, क्योंकि उसका व्यापार ठीक नहीं चल रहा था। तभी उसकी नजर खिड़की के ठीक नीचे सड़क के किनारे रहने वाले एक गरीब मोची पर पड़ी। वह मोची फटे-पुराने कपड़े पहने हुए था, लेकिन वह बहुत जोर-जोर से गाना गा रहा था और जूते सिलते समय उसके चेहरे पर गजब की मुस्कान थी। व्यापारी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा,“मेरे पास इतना धन, महल और नौकर-चाकर हैं, फिर भी मैं परेशान हूं। इस आदमी के पास कुछ नहीं है, फिर भी यह इतना खुश कैसे है?”
व्यापारी ने मोची की खुशी का रहस्य जानने के लिए एक योजना बनाई। उसने चुपके से एक थैली में 100 सोने की मोहरें डालीं और रात के अंधेरे में मोची की झोपड़ी के बाहर रख दीं। अगली सुबह जब मोची को वह थैली मिली, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसने कभी इतनी दौलत नहीं देखी थी। उसने मोहरें गिनीं कुल 99 थीं (व्यापारी ने जानबूझकर एक कम रखी थी)।
मोची ने सोचा, “सिर्फ एक मोहर और मिल जाए, तो पूरे 100 हो जाएंगे।” अब मोची का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह उस एक मोहर को कमाने के लालच में दिन-रात काम करने लगा। वह अब गाना नहीं गाता था, न ही किसी से हंसकर बात करता था। उसे डर सताने लगा कि कहीं कोई उसकी मोहरें चुरा न ले। वह देर रात तक जागता और हर समय तनाव में रहता।
कुछ दिनों बाद व्यापारी ने फिर खिड़की से देखा। मोची अब दुबला हो गया था, उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी और वह हर पल चिड़चिड़ा रहता था। व्यापारी समझ गया कि मोची ‘99 के फेर’ में फंस गया है। इस कथा से सार निकलता है कि हम अक्सर उन चीज़ों के पीछे भागते हैं, जो हमारे पास नहीं हैं (वह 100 वीं मोहर) और इस चक्कर में हम उन चीजों का आनंद लेना भूल जाते हैं, जो हमारे पास पहले से मौजूद हैं। खुशी बाहरी संपत्ति में नहीं, बल्कि मन के संतोष में होती है। -प्रमोद श्रीवास्तव
