सबसे बड़े आर्थिक हथियार होंगे, पानी-ऊर्जा और डेटा

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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अब वैश्विक शक्ति का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में हथियार ही किसी देश की ताकत तय नहीं करेंगे, बल्कि पानी, ऊर्जा और डेटा जैसी चीजें सबसे बड़े आर्थिक और रणनीतिक हथियार बन सकते हैं।

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रजत मेहरोत्रा, वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

 

दुनिया तेजी से बदल रही है। कभी युद्ध जमीन, सोना और तेल के लिए लड़े जाते थे, लेकिन अब वैश्विक शक्ति का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में केवल सेना और हथियार ही किसी देश की ताकत तय नहीं करेंगे, बल्कि पानी, ऊर्जा और डेटा जैसी चीजें सबसे बड़े आर्थिक और रणनीतिक हथियार बन सकती हैं। आज दुनिया जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, वहां इन तीन संसाधनों पर नियंत्रण ही भविष्य की आर्थिक शक्ति और राजनीतिक प्रभाव का आधार बनता दिखाई दे रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े संकट देखे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह दिखा दिया कि ऊर्जा आपूर्ति रुकने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था कैसे प्रभावित हो सकती है। यूरोप में गैस संकट बढ़ा, तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई देशों में महंगाई रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई। इसी तरह पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने दुनिया को यह एहसास कराया कि ऊर्जा केवल व्यापार नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा हथियार भी है। ऊर्जा संकट का सबसे बड़ा असर भारत जैसे देशों पर पड़ता है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। 

भारत आज अपनी जरूरत का लगभग 88–89 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। देश प्रतिदिन लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करता है। यदि वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर भारत की महंगाई, रुपये की मजबूती, परिवहन लागत और आम आदमी के बजट पर पड़ता है। यही कारण है कि आज ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुकी है।

हाल के पश्चिम एशियाई तनावों और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते जोखिम ने भारत सहित कई देशों की चिंता बढ़ाई है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहां आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। भारत सरकार और तेल कंपनियों को भी समय-समय पर वैकल्पिक आयात रणनीतियों पर काम करना पड़ा है, ताकि ईंधन आपूर्ति प्रभावित न हो, लेकिन आने वाले समय में पानी का संकट ऊर्जा से भी बड़ा खतरा बन सकता है। 

संयुक्त राष्ट्र की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की लगभग चार अरब आबादी साल में कम से कम एक महीने गंभीर जल संकट का सामना करती है। रिपोर्ट में ‘Global Water Bankruptcy’ शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि कई देश अपनी प्राकृतिक जल क्षमता से अधिक पानी उपयोग कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और भूजल के अत्यधिक दोहन ने कई देशों को गंभीर स्थिति में पहुंचा दिया है।

भारत भी इससे अछूता नहीं है। देश के कई बड़े शहरों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। नीति आयोग की पूर्व रिपोर्टों में चेतावनी दी गई थी कि दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर भविष्य में गंभीर जल संकट का सामना कर सकते हैं। आज भी भारत के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान पानी के टैंकरों पर निर्भरता तेजी से बढ़ती दिखाई देती है। कृषि, उद्योग और बढ़ती शहरी आबादी के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। 

विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं रहेगा, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक दबाव का माध्यम भी बन सकता है। दुनिया में पहले ही कई नदी जल विवाद मौजूद हैं। भारत और पड़ोसी देशों के बीच भी जल बंटवारे को लेकर समय-समय पर तनाव देखने को मिलता है। यदि जल संकट और बढ़ता है, तो आने वाले वर्षों में पानी वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन सकता है।

तीसरा और शायद सबसे आधुनिक आर्थिक हथियार है- डेटा। आज के डिजिटल युग में डेटा को ‘नया तेल’ कहा जा रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां अब तेल या स्टील कंपनियां नहीं, बल्कि डेटा आधारित टेक कंपनियां हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, मेटा और अन्य तकनीकी कंपनियों की ताकत का आधार डेटा ही है। आज लोगों की पसंद, व्यवहार, खरीदारी, बैंकिंग और यहां तक कि राजनीतिक सोच तक डेटा के माध्यम से समझी और प्रभावित की जा रही है। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के दौर में डेटा की अहमियत और बढ़ गई है। जिसके पास अधिक और बेहतर डेटा होगा, वही AI तकनीक में आगे रहेगा। यही कारण है कि अमेरिका, चीन और यूरोप डेटा सुरक्षा और डिजिटल नियंत्रण को लेकर नई नीतियां बना रहे हैं। साइबर हमले, डेटा चोरी और डिजिटल जासूसी अब वैश्विक सुरक्षा का बड़ा खतरा बन चुके हैं।

दुनिया में डेटा सेंटर उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार AI आधारित डेटा सेंटर बाजार आने वाले वर्षों में खरबों डॉलर का उद्योग बन सकता है। भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते डिजिटल बाजारों में शामिल है। UPI, डिजिटल बैंकिंग, ई-कॉमर्स और AI आधारित सेवाओं के विस्तार के कारण देश में डेटा सेंटर की मांग तेजी से बढ़ रही है। भारत में लगभग 275 डेटा सेंटर मौजूद हैं और आने वाले वर्षों में इसमें और तेज वृद्धि की संभावना है, लेकिन AI और डेटा की यह दुनिया भी ऊर्जा और पानी पर निर्भर है। 

AI आधारित डेटा सेंटर भारी मात्रा में बिजली और पानी का उपयोग करते हैं। कुछ शोधों के अनुसार आने वाले वर्षों में AI डेटा सेंटरों की बिजली खपत वैश्विक बिजली मांग का लगभग एक प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इन डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जिससे जल संकट और बढ़ सकता है। यानी भविष्य में पानी, ऊर्जा और डेटा तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए दिखाई देंगे। (ये लेखक के निजी विचार हैं)