बतकही : भ्रष्टाचारियों को भ्रष्टश्री 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
On

देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान वर्षों से चल रहे हैं। भाषण होते हैं, शपथ दिलाई जाती है, कानून बनते हैं, आयोग गठित होते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार है कि मानता ही नहीं। वर्तमान परिवेश में लगता है कि यह कोई बुराई नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय जीवनशैली का अभिन्न अंग बनकर “भ्रष्टाचारिणः सर्वत्र पूज्यंते” को मान्यता दे रहा है। कहते हैं कि जीवन में मिलावट नहीं होनी चाहिए, लेकिन आज तो मिलावट ही जीवन का दूसरा नाम बन गई है।

दवा में मिलावट, दूध में मिलावट, मसालों में मिलावट, मिठाइयों में मिलावट, खाद और बीज में मिलावट, हवा और पानी तक में मिलावट। इतना ही नहीं, अब तो रिश्तों में भी मिलावट है, वादों में मिलावट है, राजनीति में मिलावट है और मोहब्बत में भी मिलावट है। शुद्ध यदि कुछ बचा है, तो शायद केवल मिलावट का प्रतिशत! भ्रष्टाचार का भी यही हाल है। 

कार्यालय हो या न्यायालय, विद्यालय हो या कॉलेज, अस्पताल हो या बाज़ार, ठेका हो या परमिट, भर्ती हो या भुगतान अब तो मंदिरों में भी अपनी दस्तक दे चुका है। जन-मानस को ऐसा प्रतीत होने लगा है कि बिना भ्रष्टाचार के कोई काम पूरा हो ही नहीं सकता! वर्तमान में यह भी एक अनकहा नियम बनता जा रहा है कि जितनी बड़ी कुर्सी, उतनी बड़ी कमाई। राजनीति, प्रशासन, ठेकेदारी और सरकारी तंत्र के अनेक प्रभावशाली लोगों की संपत्तियों में समय के साथ होने वाली आश्चर्यजनक वृद्धि अक्सर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाती है।  

रिश्वत लेने की उत्कृष्ट कला के लिए ‘भ्रष्ट श्री’, बड़े-बड़े घोटालों में असाधारण योगदान के लिए ‘भ्रष्ट भूषण’ और वर्षों तक व्यवस्था को खोखला करते हुए भी प्रतिष्ठा बनाए रखने वालों के लिए ‘भ्रष्ट विभूषण’ दिया जाए। यदि किसी ने सार्वजनिक धन को निजी वैभव में बदलने की कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया हो, तो उसे  ‘भ्रष्ट रत्न’ से अलंकृत किया जाए।  हमारे राष्ट्र का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ केवल राष्ट्रीय प्रतीक पर अंकित शब्द नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और जीवन-दर्शन का उद्घोष है । 

वेद, पुराण और उपनिषद हमें सत्य, धर्म, कर्तव्य तथा ईमानदारी के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। जब अन्याय, अहंकार और अधर्म अपनी सीमा पार कर जाते हैं, तब परिवर्तन का शंखनाद होता है। जब पाप का घड़ा भर गया, तब धर्म की स्थापना के लिए युद्ध अनिवार्य हुआ। विज्ञान और दर्शन का स्पष्ट मत है कि हर अति का अंत निश्चित है। भ्रष्टाचार का भी अंत होगा, जब जिम्मेदार नागरिक आगे आएंगे।


डॉ.विनय कुमार मिश्र