अद्भुत, अतुलनीय और रहस्यमय बाराटांग
मीलों तक फैला घना जंगल, रहस्यमय सन्नाटा, दुर्लभ आदिवासी जनजाति जारवा, मैंग्रोव के बीच बहते बैकवॉटर, लाखों वर्षों में बनी चूना-पत्थर की गुफाएं और एक ऐसा ज्वालामुखी जो लावा नहीं, बल्कि कीचड़ उगलता है। यदि यह सब आपको एक दिन की ही यात्रा में देखने को मिल जाए, तो रोमांच का अंदाजा लगाया जा सकता है। यही तो है बाराटांग की विशेषता, जिसे अपने प्राकृतिक अजूबे के साथ जारवा जनजाति के लिए जाना जाता है।
जारवा लोग धरती पर मौजूद उन आदिम जनजातियों में शामिल हैं जो आज भी पाषाण युग में जी रहे हैं। यह जनजाति पत्तों से अपना शरीर ढकती है, मछली, फल और नारियल खाती है, और यहां तक कि आग जलाने के लिए अधिकतर पत्थरों का ही इस्तेमाल करती है। इस जनजाति का बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है। धूप से झुलसी काली त्वचा, घुंघराले बाल और छोटा कद। लेकिन इनकी संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है, अब तो 500 से भी कम बताई जाती है।
पोर्ट ब्लेयर से 100 किमी दूर, पुलिस काफिले के साथ प्रवेश
11.jpg)
हम अपने हनीमून पर अंडमान गए थे। वापसी से एक दिन पहले टूर ऑपरेटर ने बारटांग का जिक्र किया। इसके बाद तो जितना इस द्वीप के बारे में सुना, उतना ही उत्साह और आकर्षण बढ़ता गया, फिर क्या था अगले ही दिन हम इस अनोखी यात्रा पर निकल पड़े। बारटांग, पोर्ट ब्लेयर से लगभग सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन इसकी यात्रा सामान्य नहीं है। यहां सुबह केवल पुलिस काफिले के साथ ही प्रवेश मिलता है। इसलिए सुबह पांच बजे ही हम होटल से निकल पड़े। कुछ ही देर में शहर पीछे छूट गया और उसकी जगह हरे-भरे गांव और घने जंगलों ने ले ली। करीब दो घंटे बाद हम बारटांग के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। पहचान-पत्रों की जांच के बाद ठीक नौ बजे हमारा काफिला जरावा आरक्षित क्षेत्र में प्रवेश कर गया।
वाहन रोकना और तस्वीर लेना पूरी तरह प्रतिबंधित
जरावा जनजाति दुनिया की सबसे प्राचीन जनजातियों में गिनी जाती है। माना जाता है कि उनके पूर्वज हजारों वर्ष पहले अफ्रीका से यहां आए थे। आज भी यह जनजाति आधुनिक जीवन से लगभग पूरी तरह अलग अपनी पारंपरिक संस्कृति के साथ जीवन व्यतीत कर रही है। जंगल के बीच से गुजरती शांत सड़क, हवा में झूमते पेड़, अनसुनी चिड़ियों की आवाजें और हर मोड़ पर जरावा जनजाति की एक झलक पाने की उत्सुकता यात्रा को अविस्मरणीय बना रही थी। इसी बीच नदी के किनारे एक जरावा परिवार दिखाई दिया। एक पुरुष, एक महिला और तीन बच्चे। कुछ क्षणों के लिए हमारी और उनकी नजरें मिलीं। हम उन्हें ठीक से समझना चाहते थे, लेकिन यहां वाहन रोकना, तस्वीर लेना या उनसे संपर्क करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। कुछ ही पलों में वे जंगल में ओझल हो गए, पर उनकी वह एक झलक जैसे स्मृतियों में बस गई।
लाइमस्टोन गुफाएं और मैंग्रोव जंगल जैसे कोई रहस्यमयी दुनिया
जंगल पार करने के बाद हम फेरी से बारटांग द्वीप पहुंचे। इसके बाद आठ लोगों की एक छोटी मोटरबोट हमें लाइमस्टोन गुफाओं की ओर ले चली। यात्रा का यह हिस्सा शायद सबसे सुंदर था। दोनों ओर फैले मैंग्रोव जंगल, साफ नीला पानी और फिर अचानक मुख्य धारा छोड़कर संकरे बैकवॉटर में प्रवेश करती मोटरबोट। ऐसा लग रहा था मानो हम किसी रहस्यमयी दुनिया में पहुंच गए हों। कुछ देर बाद लकड़ी के बने छोटे से घाट पर उतरकर पैदल चलना पड़ा। इसके बाद सामने थीं बारटांग की प्रसिद्ध लाइमस्टोन गुफाएं। लाखों वर्षों तक पानी की बूंदों में घुले कैल्शियम कार्बोनेट ने इन गुफाओं के भीतर अद्भुत आकृतियां गढ़ी हैं। कहीं शिवलिंग का आभास होता है, कहीं गणेश, कहीं हाथी तो कहीं शेर की आकृति दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति स्वयं यहां एक महान शिल्पकार बन गई हो।
कीचड़ उगलने वाला ज्वालामुखी
गुफाओं से लौटकर हमारी अगली मंज़िल थी मड वॉल्केनो। ज्वालामुखी का नाम सुनते ही लावा उगलते पहाड़ों की छवि बनती है, लेकिन बारटांग का यह ज्वालामुखी कीचड़ उगलता है। धरती की गहराइयों से धीरे-धीरे निकलता मिट्टी का यह बुलबुलाता प्रवाह प्रकृति के एक और अनोखे चमत्कार से परिचित कराता है। दोपहर ढलने लगी थी और अब लौटने का समय था। वापसी के रास्ते फिर वही जंगल, वही फेरी और वही सड़क थी, लेकिन अब अनुभव बिल्कुल नया था। बारटांग केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति के रहस्यों से भरी एक जीवंत प्रयोगशाला है। यदि आप अंडमान जाएं और केवल समुद्र तट देखकर लौट आएं, तो समझिए आपने इस द्वीपसमूह का सबसे रोमांचकारी अध्याय अभी पढ़ा ही
