करेरू: नशे में झूमने वाला अनोखा पक्षी

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Published By Anjali Singh
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करेरू (Kererū) न्यूज़ीलैंड में पाई जाने वाली कबूतर की एक विशिष्ट और स्थानिक (एंडेमिक) प्रजाति है। इसे न्यूज़ीलैंड वुड पिजन और कुकुपा भी कहा जाता है। अपने बड़े आकार और आकर्षक रंगों के कारण यह दुनिया के सबसे प्रभावशाली कबूतरों में गिना जाता है। इसकी लंबाई लगभग 50 सेंटीमीटर और वजन 850 ग्राम तक हो सकता है। इसके पंख धातु जैसी चमक लिए हरे, नीले और बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं, जबकि छाती और पेट का भाग सफेद होता है। इसकी लाल आंखें और चमकीली चोंच इसे और भी आकर्षक बनाती हैं।

करेरू मुख्य रूप से न्यूज़ीलैंड के देशी जंगलों, तटीय वनों और बड़े पेड़ों वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। इसका भोजन विभिन्न प्रकार के फल, जामुन, कोमल पत्तियां, कलियां और फूल हैं। यह उन कुछ पक्षियों में शामिल है जो बड़े आकार के फलों को पूरा निगल सकते हैं। बाद में उनके बीज सुरक्षित रूप से मल के साथ बाहर निकलते हैं और नई जगहों पर अंकुरित हो जाते हैं। इसी कारण करेरू को न्यूज़ीलैंड के जंगलों का प्राकृतिक बीज वितरक माना जाता है। कई देशी वृक्षों के संरक्षण और नए पौधों के उगने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस पक्षी की सबसे रोचक पहचान इसकी तथाकथित "नशे की आदत" है। गर्मियों में जब पेड़ों से गिरे फल लंबे समय तक पड़े रहते हैं, तो उनमें प्राकृतिक रूप से किण्वन (फर्मेंटेशन) होने लगता है और थोड़ी मात्रा में अल्कोहल बन जाती है। ऐसे फल खाने के बाद कई करेरू असंतुलित होकर उड़ने, पेड़ों से टकराने या जमीन पर लड़खड़ाते हुए दिखाई देते हैं। न्यूज़ीलैंड में वन्यजीव बचाव केंद्रों को हर वर्ष ऐसे कई करेरू मिलते हैं, जिन्हें कुछ समय की देखभाल के बाद दोबारा जंगल में छोड़ दिया जाता है।

करेरू का पारिवारिक जीवन भी उल्लेखनीय है। यह प्रजाति सामान्यतः एक ही साथी के साथ लंबे समय तक रहती है। मादा एक बार में केवल एक अंडा देती है और उसकी देखभाल नर और मादा दोनों मिलकर करते हैं। हालांकि अतीत में जंगलों की कटाई और बाहरी शिकारी जीवों के कारण इसकी संख्या प्रभावित हुई थी, लेकिन आज यह न्यूज़ीलैंड में कानूनी रूप से संरक्षित पक्षी है। वन संरक्षण और आवास सुधार कार्यक्रमों के कारण इसकी आबादी में धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है। अपनी सुंदरता, अनोखे व्यवहार और जंगलों के पुनर्जनन में महत्वपूर्ण भूमिका के कारण करेरू न्यूज़ीलैंड की प्राकृतिक धरोहर का एक अनमोल हिस्सा माना जाता है।