जॉब का पहला दिन : सेवा और मानवता के प्रति समर्पण का संकल्प 

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Published By Anjali Singh
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शिक्षा पूरी होने के बाद जब मुझे जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर में लेक्चरर के रूप में नियुक्ति मिली, तो वह मेरे जीवन का सबसे यादगार दिन था। जिस संस्थान में कभी मैं एक छात्र के रूप में अपने शिक्षकों के सामने बैठकर ज्ञान प्राप्त करता था, उसी संस्थान में शिक्षक बनकर प्रवेश करना मेरे लिए गर्व, उत्साह और जिम्मेदारी- तीनों का अनूठा संगम था।

नौकरी के पहले दिन जब मैं कॉलेज परिसर में पहुंचा, तो मन में अनेक भाव एक साथ उमड़ रहे थे। वही इमारतें, वही गलियारे और वही ऑपरेशन थिएटर, जिन्हें कभी विद्यार्थी के रूप में देखा था, अब मेरे कार्यस्थल बन चुके थे। विभाग में प्रवेश करते ही वरिष्ठ शिक्षकों और सहकर्मियों ने आत्मीयता के साथ मेरा स्वागत किया। उनसे मिले स्नेह ने मेरे मन का संकोच दूर कर दिया और यह विश्वास दिलाया कि अब मुझे केवल सीखना ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को सिखाने का दायित्व भी निभाना है।

पहले ही दिन मुझे ओपीडी और वार्ड में मरीजों को देखने का अवसर मिला। मरीजों की आंखों में डॉक्टर के प्रति विश्वास देखकर मुझे एहसास हुआ कि यह पेशा केवल ज्ञान का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भी है। उसी दिन मैंने अपने विद्यार्थियों के साथ भी समय बिताया। उन्हें देखकर मुझे अपना छात्र जीवन याद आ गया और मैंने मन ही मन संकल्प लिया कि जिस प्रकार मेरे शिक्षकों ने मुझे मार्गदर्शन दिया, उसी समर्पण के साथ मैं भी अपने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करूंगा।

उस पहले दिन ने मुझे यह सिखाया कि एक डॉक्टर का कार्य केवल रोग का उपचार करना नहीं, बल्कि मरीज का विश्वास जीतना भी है। चिकित्सा विज्ञान में मशीनें और जांच महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंतिम निर्णय चिकित्सक के ज्ञान, अनुभव, विवेक और करुणा पर निर्भर करता है। यही सिद्धांत मैंने अपने पूरे चिकित्सकीय जीवन में अपनाया और हमेशा मरीज को केवल उसकी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि उसकी पूरी परिस्थिति को समझकर उपचार देने का प्रयास किया।

आज जब मैं उसी विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहा हूं, तब भी नौकरी का वह पहला दिन मुझे प्रेरणा देता है। वह दिन मेरे लिए केवल एक नई शुरुआत नहीं था, बल्कि सेवा, शिक्षण और मानवता के प्रति आजीवन समर्पण का संकल्प था।  गांव की पगडंडियों से मेडिकल कॉलेज तक और एक छात्र से विभागाध्यक्ष बनने तक की यह यात्रा मुझे हमेशा याद दिलाती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदार हो और सेवा जीवन का उद्देश्य हो, तो हर सपना साकार किया जा सकता है।

- डॉ. हरेंद्र कुमार गौतम, कानपुर