अफजल : श्रेष्ठ रंगों का दरिया
देवास, मध्य प्रदेश के वरिष्ठ चित्रकार अफजल पठान (1936-2000) उन महत्वपूर्ण समकालीन भारतीय कलाकारों में हैं, जिन्होंने अमूर्त चित्रकला को स्थानीय अनुभव, ग्रामीण स्मृतियों और प्रकाश की संवेदना से एक विशिष्ट पहचान दी। इन दिनों नई दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम स्थित श्रीधरानी आर्ट गैलरी में उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी आयोजित है। 30 जून से आरंभ हुई यह प्रदर्शनी 10 जुलाई तक चलेगी।
इसका आयोजन रजा फाउंडेशन ने किया है और क्यूरेशन है वरिष्ठ कलाकार अखिलेश का। मेरे लिए अफजल पठान का नाम अपेक्षाकृत नया था, जब 2021 में पहली बार उनके बारे में जानकारी मिली। दरअसल तब रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल ने वरिष्ठ कलाकार एवं कला समीक्षक अशोक भौमिक की पहल पर कुछ चुनिंदा भारतीय कलाकारों पर मोनोग्राफ प्रकाशित करने का निर्णय लिया। वर्ष 2022-23 में प्रकाशित इस मोनोग्राफ, जिसके लेखक कलाकार एवं कला समीक्षक महावीर वर्मा हैं, ने अफजल की कला-दृष्टि से मेरा विस्तृत परिचय कराया।
इस प्रकाशित मोनोग्राफ में महावीर वर्मा लिखते हैं कि अफजल के चित्रों का केंद्रीय तत्व प्रकाश है। इस संदर्भ में वे कलाकार प्रभु जोशी के संस्मरण का उल्लेख करते हैं। जब प्रभु जोशी ने उन पर दूरदर्शन के लिए फिल्म बनाने की इच्छा व्यक्त की तो अफजल ने अक्टूबर की धूप में चित्रांकन का सुझाव देते हुए कहा कि यही प्रकाश का सबसे सुंदर समय होता है। प्रभु जोशी ने मजाक में पूछा-“फिर चांदनी रात का लैंडस्केप नहीं बनाओगे?” इस पर अफजल का उत्तर था-“चांदनी है क्या? चांद से टकराकर लौटी धूप ही तो है। मैं उस जगह को चित्रित करना चाहता हूं, जहां छोटा-सा दिया भी रोशनी दे रहा हो।” यह कथन उनकी संपूर्ण चित्र-दृष्टि का परिचायक है।
प्रदर्शनी के कैटलॉग में अखिलेश का भावनात्मक संस्मरण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे बताते हैं कि छात्र जीवन में उन्होंने पहली बार सुना कि देवास में एक कलाकार हैं, जो केवल अमूर्त चित्र बनाते हैं। बाद में वे मित्रों के साथ इंदौर से साइकिल चलाकर उनके घर पहुंचे। वहां आत्मीय स्वागत, अंडा-रोटी का स्नेह और चित्रों पर लंबी बातचीत ने उन्हें जीवनभर के लिए प्रभावित किया। अखिलेश के अनुसार अफजल के चित्र किसी निश्चित अर्थ की ओर नहीं ले जाते, बल्कि देखने की एक नई आदत विकसित करते हैं। उनके टूटे किनारे, बहते रूपाकार और प्रकाश से आलोकित रंग-दुनिया दर्शक को चित्र के भीतर खींच लेती है।
अफजल पठान की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि उनके माध्यम के चयन में दिखाई देती है। उन्होंने एनामेल रंगों, जिन्हें सामान्यतः साइनबोर्ड पेंटिंग का माध्यम माना जाता था, को रचनात्मक चित्रकला की भाषा में रूपांतरित कर दिया। चित्रकार मनीष पुष्कले बताते हैं कि अफजल ने इस माध्यम की सभी सीमाओं को तोड़ते हुए उसे समकालीन चित्रकला का प्रभावशाली माध्यम बना दिया। रंगों के बहाव, पारदर्शिता और सतह पर उनके अद्भुत नियंत्रण ने उनकी चित्र-भाषा को विशिष्ट बनाया। उनके चित्रों को देखकर कई बार विश्वास ही नहीं होता कि वे हाथ से बनाए गए हैं।
अखिलेश लिखते हैं
वही अखिलेश लिखते हैं कि अफजल के यहां ब्रश उसी तरह चलता था, जैसा कलाकार चाहता था, रंग उसी तरह फैलते थे, जैसे वे उन्हें फैलाना चाहते थे। एक ही तकनीक में काम करने के बावजूद उनके दो चित्रों में समानता खोजना लगभग असंभव है। उनके रूपाकार कभी ठोस चट्टानों की तरह उभरते हैं, तो कभी बहते हुए प्रकाश में विलीन हो जाते हैं। प्रसिद्ध कलाकार जगदीश स्वामीनाथन ने उनके चित्र देखकर जिगर मुरादाबादी का यह शेर पढ़ा था-“अगर अल्लाह तौफीक न दे, इंसान के बस का काम नहीं है।” यह टिप्पणी अफजल की विलक्षण सृजनात्मक क्षमता को रेखांकित करती है।
इस प्रदर्शनी को दर्शकों तक पहुंचाने का श्रेय निस्संदेह रजा फाउंडेशन और उसके प्रमुख वरिष्ठ कवि एवं कला-चिंतक अशोक वाजपेयी को जाता है। साथ ही, अफजल पठान के निधन के लगभग छब्बीस वर्ष बाद भी उनकी कृतियों को सुरक्षित रखने के लिए उनके परिजनों-विशेषकर रईस खान और शरीफ खान का योगदान भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यह कार्य इसलिए और कठिन था, क्योंकि उनकी अधिकांश कृतियां कागज पर बनी हैं, जिनके संरक्षण के लिए विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है।
दिल्ली की यह प्रदर्शनी केवल एक कलाकार की स्मृति का आयोजन नहीं है, बल्कि भारतीय आधुनिक कला के एक ऐसे विलक्षण अध्याय की पुनर्खोज है, जिसे लंबे समय तक अपेक्षित महत्व नहीं मिला। यह प्रदर्शनी याद दिलाती है कि भारतीय अमूर्त कला का इतिहास केवल महानगरों में नहीं लिखा गया, देवास जैसे शहरों में भी ऐसे कलाकार मौजूद थे, जिन्होंने अपने रंगों, प्रकाश और मौलिक चित्र-भाषा से भारतीय आधुनिकता को एक नया आयाम दिया।
