लोकायन : अगनाव: कुमाऊं की प्राचीन कृषि परंपरा

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Published By Anjali Singh
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देवभूमि उत्तराखंड केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी हिमालयी संस्कृति, लोक परंपराओं, प्राकृतिक सौंदर्य और वीर सैनिकों की भूमि के कारण भी विश्व प्रसिद्ध है।  राज्य के कुमाऊं मंडल की एक प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है ‘अगनाव’। इस परंपरा में रबी की फसल (गेहूं व अन्य) की कटाई कर पहली फसल का भोग ग्रामवासी अपने क्षेत्र के किसी सिद्ध मंदिर में लगाते हैं (देवी मंदिर, हरजू मंदिर या अन्य देवताओं के मंदिर में)। पहाड़ों पर ज्येष्ठ मास यानी हिंदू पंचाग के तीसरे महीने में इसकी झलक देखने को मिलेगी। 

देवी को भोग लगाने के बाद क्षेत्रवासी मिलजुलकर उसी अनाज का हलवा और पुआ का प्रसाद बनाकर ग्रामवासियों को वितरण करते हैं। प्रसाद तिमिल के पत्तों में वितरित किया जाता है, क्योंकि तिमिल के पत्ते अति शुद्ध माने जाते हैं और लगभग हर मांगलिक कार्यों में प्रयोग आते है।

रात्रि के समय जगराता (जागरी) भी होता है, जिसमें डंगरिया अलग-अलग वाद्य यंत्र जैसे हुड़का, ढोल, थाली, डमरु, रणसिंघा का प्रयोग कर देवताओं का आह्वान करता है। इस वक्त एक अद्भुत और दिव्य वातावरण नजर आता है। मान्यता है कि ऐसे में यहां मौजूद लोगों को साक्षात दैवीय शक्ति का अनुभव होता है। माना जाता है कि इसी क्रम में देवी-देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त कर ग्रामवासी प्रफुल्लित हो कर नई शक्ति विश्वास और ऊर्जा के साथ आगे अपने-अपने खेती का कार्य करते हैं। इसी पर्व का दूसरा भाग, जो एक-दो दिन बाद ग्रामवासी जंगल में जंगल के देवता (भेलू देवता) को कई प्रकार के व्यंजन जैसे दाल, चावल, पूड़ी, सब्जी  एवं पुए अन्य का भोग लगा कर करते हैं।

ग्रामवासियों के अनुसार व्यक्ति विशेष, जिस पर जंगल देवता की शक्ति आती है वह शख्स उसी समय भविष्य की बरसात की सटीक जानकारी बताता है, जो कि वर्षों से सत्य होती आ रही है। यह सब देखकर लगता हैं कि देवभूमि विज्ञान को भी कही न कही कई बार चुनौती देता है। संभवत: इसीलिए उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। 

दरअसल, इस तरह के पर्व और परंपराएं पहाड़ों की कठिन जीवनशैली और संघर्ष में जीवन में ग्रामवासियों का न केवल मनोबल और विश्वास बढ़ाते हैं, बल्कि अपनी संस्कृति से भी जुड़े रहने की सीख देते हैं। यह कृषि सांस्कृतिक परंपरा सारे गांव की एकता और भाईचारे को भी बढ़ावा देती है, जिसमें सारे ग्रामवासी मिलकर अपना सहयोग देते हैं। 

यह परंपरा उत्तराखंड की संस्कृति जो कि प्राकृतिक सुंदरता, हिमालयी परिवेश, और अध्यात्म का अद्भुत मिश्रण है, उस पर एक अलग छाप छोड़ती है। साथ ही यह परंपरा देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति को जीवित रखती है। इतना ही नहीं, अधिकतर नई युवा पीढ़ी जो पश्चिमी सभ्यता की ओर आकर्षित है, उसे अपनी मूल जड़ों से जोड़ती है। पलायन जैसी स्थिति पर अंकुश लगाने का यह प्रभावशाली विकल्प भी है।

हर्ष पंत