कबीर जयंती : सुमिर बंदगी कर साहिब की काल नवावे माथा...
18 वीं शताब्दी के आरंभ में कबीर के जीवन के साथ कई चमत्कारिक बातें जुड़ने लगीं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानंद के आशीर्वाद द्वारा एक विधवा ब्रह्मणी के पुत्र थे। अनजाने में विधवा ब्राह्मणी को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी ने उस बालक को लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया। कबीर पंथियों ने तो यहां तक माना है कि कबीर के कोई माता-पिता न थे। उन्होंने आकाश से एक ज्योति के रूप में उतरकर बालक का रूप धारण कर लिया।
परंतु संत रविदास, गुरु अमरदास, रज्जब आदि संतों ने स्पष्ट किया है कि कबीर ने एक मुस्लिम जुलाहिन के उदर से जन्म लिया। कबीर के शिष्य धर्मदास कहते हैं कि कबीर की माता तुर्क और पिता जुलाहा थे। रविदास के अनुसार उनके यहां ईद आदि त्योहारों पर जानवरों की बलि भी दी जाती थी। वास्तव में संतों की कोई जाति नहीं होती। कबीर स्वयं कहते हैं कि वे न हिंदू हैं न मुसलमान, वे हर मनुष्य की ही तरह पांच तत्वों से बना शरीर धारण किए हुए हैं, जिसमें अदृश्य आत्मा निवास करती है।
कबीर का जन्म सन् 1398 में हुआ था, उनके पिता नीरू और माता नीमा जाति के जुलाहे थे। वे बनारस में शहर के बाहरी छोर पर रहते थे। बचपन से ही कबीर की रुचि परमार्थ में थी, जबकि उनको विधिवत शिक्षा का अवसर नहीं मिला, फिर भी कबीर की रचनाओं से पता चलता है कि वे एक विवेकशील व तीव्र बुद्धि थे, जिन्हें गूढ़ रहस्यों को समझने तथा उनका एवं उनका विवेचन करने की असाधारण योग्यता प्राप्त थी। बचपन से ही कबीर जुलाहे के व्यवसाय में अपने पिता का हाथ बंटाने लगे। धीरे-धीरे वे इस व्यवसाय में कुशल हो गए। साथ ही वे अपना कुछ समय अध्यात्म में बिताते थे, जिसको देखकर उनके माता-पिता चिंतित हो उठते थे।
मध्य कालीन कवियों ने कबीर को महान भक्त और संत माना है, परंतु बीसवीं शताब्दी के विद्वानों ने कबीर को केवल एक समाज सुधारक के रूप में देखा है। परंतु कबीर समाज सुधारक नहीं थे और न ही उनके जीवन का उद्देश्य समाज सुधार था। उनका ध्येय केवल रुहानी व आध्यात्मिक था, सामाजिक नहीं। न तो वे उपदेशक थे, न दार्शनिक, न पंडित थे, न विद्वान, वे हरि के जन थे, प्रभु प्रेमी थे। उन्होंने अपने अंतर में परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया था और वे किसी और को भी उसकी प्राप्ति के मार्ग पर लगाने की अद्भुत ताकत रखने वाले पूर्ण गुरु थे। कबीर साहिब सच्चे गुरु की शरण में जाने के बारे में कहते हैं। अनुराग सागर कबीर साहिब और उनके शिष्य धर्मदास के बीच हुए संवाद के रूप में रचित एक प्रमुख ग्रंथ है। इसमें गुरु महिमा करते हुए लिखा है कि जग में गुरु समान नहीं दाता, बस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु भली बताई बाता। सुमिर बंदगी कर मालिक की काल नवावे माथा। जग में...
कबीर साहिब हमेशा मेहनत और ईमानदारी की कमाई से ही अपना तथा अपने परिवार का गुजारा करते थे। करीब के शिष्यों में राजा, नवाब, सेठ व साहूकार भी थे, जो कबीर को सब प्रकार के सुख-साधन व धन-संपत्ति आदि भेंट कर सकते थे। परंतु कबीर ने कभी अपने व परिवार के लिए कोई भेंट मंजूर नहीं की और न ही कभी किसी के आगे हाथ फैलाया। कबीर साहिब कहते हैं कि संत को अपने शिष्यों से प्रेम चाहिए, धन नहीं, जो धन के भूखे हैं, वे संत नहीं होते। कबीर के अनुसार मांगने को लेकर लिखा गया है-मर जाऊं मांगू नहीं, अपने तन के काज।
परमारथ के कारने मोहि न आवे लाज। कबीर साहिब निर्भीक और स्पष्टवादी थे। कट्टरता और रूढ़िवाद के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। एक बार कुछ पंडित गंगा जल की महिमा का बखान करते हुए उनसे बोले कि गंगा का पानी घोर पापियों के पाप को धोकर उन्हें पवित्र कर देता है। यह सुनकर कबीर ने अपने लोटे में रखा गंगा का पानी पंडितों को पीने के लिए दिया। इस पर पंडित बहुत क्रोधित हुए। एक नीच जुलाहे का यह साहस कि उच्च ब्राह्मणों को अपने अपवित्र लोटे से पानी पीने को कहे, इस पर कबीर ने कहा कि यदि गंगाजल मेरे लोटे को पवित्र न कर सका, तो यह पापियों के पाप कैसे धो सकता है।
एक दिन कबीर अपने शिष्यों को दर्शन देकर अपनी कुटिया में चले गए और हुक्म दे गए कि कोई अंदर न आए। दोपहर होने पर शिष्य अंदर गए, तो कबीर धरती पर लेटे थे। परंतु जिस सागर से लहर उठी थी वह उसी विशाल सागर में समा चुकी थी। सन् 1518 में कबीर की आत्मा इस नाश्वर जगत को छोड़कर परमपिता परमात्मा में लीन हो गई।
कबीर के अंतिम संस्कार को लेकर शिष्यों में मतभेद हो गया। राजा वीरसिंह बघेला के नेतृत्व में हिंदू कबीर के शव का अग्नि संस्कार करना चाहते थे, परंतकु नवाब बिजलीखान और मुस्लिम शिष्य उसे दफनाना चाहते थे। दोनों पक्षों में विवाद के चलते झगड़े की नौबत आ गई। उसी समय कुछ शिष्यों ने सभी का ध्यान कबीर के शव की ओर आकर्षित किया। कहते हैं कि कपड़ा हटाने पर शव के स्थान पर वहां फूलों का ढेर मिला।
