एक विरले इतिहास लेखक की स्मृति 

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Published By Anjali Singh
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इतिहास लेखन एक दुधारी तलवार की तरह है। इसमें सतर्कता और प्रामाणिकता की ऐसी डगर पर चलकर लक्ष्य पर पहुंचना होता है कि एक ओर खाई, दूसरी ओर कुआं। पर आपने यदि निष्पक्ष लेखकीय प्रतिबद्धता पर चलते हुए इसे निष्कंटक पार कर लिया, तो आप एक न एक दिन इस विधा में मानक बनाने में सफल अवश्य होंगे। 

इतिहास लेखन में ऐसे मानक देश में कम ही लोग बना पाए हैं। इंदौर को कर्मस्थली बनाकर रहे प्रोफेसर शरद पगारे स्वयं को अमृतलाल नागर और वृंदावनलाल वर्मा की परंपरा का वाहक मानते थे, पर एक ईमानदार मूल्यांकन किया जाए, तो वास्तव में वे इन लेखकों से भी आगे और इतिहास लेखन में उच्चतम स्तर पर पहुंचे लेखक थे। 

अब से दो वर्ष पूर्व, 28 जून 2024 को वे महाप्रयाण पर निकल गए थे। तब उनकी आयु 93 वर्ष थी। वे उस समय भी रचनाकर्म में लीन थे। उन्होंने इतिहास, समाज और मनुष्य की आंतरिक त्रासदियों को एक साथ कथानक में ढालने की दुर्लभ क्षमता विकसित की। इसलिए उनका साहित्य इतिहास की विस्मृत कहानियां कहने का माध्यम होने के साथ एक वैचारिक हस्तक्षेप भी बना।

5 जुलाई 1931 को खंडवा, मध्य प्रदेश में जन्मे शरद पगारे ने इतिहास विषय में एमए, पीएचडी की। मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग और विदेशी विश्वविद्यालयों में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में कई दशकों तक अध्यापन, शोध के साथ ही ऐतिहासिक एवं साहित्यिक कथाओं व उपन्यासों का नियमित लेखन किया। यह अद्भुत था कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लेखन को माध्यम बनाकर उभरते हुए युवा शरद पगारे ने इक्कीसवीं शताब्दी तक अपनी रचनात्मकता को निरंतर बनाए रखा। उनका लेखन दर्शाता है कि साहित्य समय का दस्तावेज होने के साथ उसे समझने और संवाद करने का साधन भी है। उन्होंने इतिहास को घटनाओं में छिपे मानवीय भावों, संघर्षों और विडंबनाओं के रूप में देखा। यही कारण है कि उनके कथानक पाठकों के लिए ज्ञान और संवेदना का भी माध्यम बनते हैं।

उनके रचनाकर्म में एक स्पष्ट विकासक्रम दिखाई देता है। प्रारंभिक चरण में उनका लेखन ऐतिहासिक प्रेमकथाओं और इतिहास में अनदेखी घटनाओं के पुनर्सृजन पर केंद्रित रहा। उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहां की प्रेमिका “गुलारा बेगम” और औरंगजेब की अल्पचर्चित प्रेमिका “बेगम जैनाबादी”, जैसी कृतियों को सामने लाने का उपक्रम किया, जिन पर इतिहास में दो-चार पृष्ठों की सामग्री भी उपलब्ध नहीं है। 

इसके बाद उनका लेखन अधिक गहरे ऐतिहासिक विश्लेषण की ओर बढ़ता है, जिसका चरम “पाटलिपुत्र की साम्राज्ञी” में दिखाई देता है। इसकी नायिका थी वह स्त्री जिसने वास्तविक जीवन में पृष्ठभूमि में रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह अशोक महान की मां धर्मा थी, एक निर्धन दरिद्र ब्राह्मण की अपूर्व, अद्वितीय एवं अनिंद्य सुंदरी बेटी। यहां इतिहास, राजनीति और संस्कृति का एक सुंदर समेकित चित्रण मिलता है।  इसके समानांतर “गंधर्वसेन” जैसी कृतियां प्राचीन इतिहास की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। 

“उजाले की तलाश” जैसी रचनाओं में वे समकालीन सामाजिक यथार्थ की ओर भी मुड़ते हैं, जिससे उनका लेखन इतिहास से वर्तमान तक एक सतत संवाद स्थापित करता रहा है। इस प्रकार उनका उपन्यास-साहित्य सृजन एक क्रमिक वैचारिक यात्रा है, जिसमें इतिहास, प्रेम, समाज और मनोविज्ञान विस्तार पाते हैं। 

शरद पगारे आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका साहित्य आज भी हमारे साथ है। वह हमें सोचने का अवसर देता है, प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित करता है और सबसे महत्वपूर्ण, हमें मनुष्य बने रहने की याद दिलाता है। यही उनकी उपलब्धि है और यही उनकी अमरता का आधार भी।

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राजगोपाल सिंह वर्मा लेखक