युद्ध-प्रतिरोध की कला और हमारी बेरुखी
भारतीय कला इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपनी कला को केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने समय की सामाजिक सच्चाइयों का दस्तावेज बना दिया। चित्तप्रसाद भट्टाचार्य और जैनुल आबेदीन ऐसे ही कलाकार थे, जिन्होंने 1943 के बंगाल अकाल की भयावह त्रासदी को अपनी रचनाओं के माध्यम से दुनिया के सामने रखा। जब अधिकांश कला-जगत सांस्कृतिक प्रतीकों और सौंदर्यबोध में व्यस्त था, तब इन कलाकारों ने भूख, गरीबी, विस्थापन और मानवीय पीड़ा को अपनी कला का विषय बनाया। उनकी कृतियां केवल चित्र नहीं, बल्कि उस दौर की ऐतिहासिक गवाही हैं, जो औपनिवेशिक नीतियों और सामाजिक असमानताओं की कठोर सच्चाइयों को उजागर करती हैं। चित्तप्रसाद और जैनुल आबेदीन की कला यह सिद्ध करती है कि कलाकार केवल सृजक ही नहीं, बल्कि समाज का सजग साक्षी भी होता है, जो इतिहास के अनकहे पक्षों को सामने लाने का साहस रखता है।
चित्तप्रसाद भट्टाचार्य (21 जून 1915 - 13 नवंबर 1978) 20 वीं सदी के एक प्रमुख भारतीय चित्रकार थे, जो अपनी कला के माध्यम से आम जनता, किसान आंदोलनों और बंगाल के अकाल की त्रासदियों को सामने लाने के लिए जाने जाते थे। कला इतिहास को यदि केवल संग्रहालयों, नीलामी घरों और कला-बाजार के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि कला का विकास मुख्यतः शैलीगत प्रयोगों, सौंदर्यबोध और तकनीकी नवाचारों की कहानी है। किन्तु इसी इतिहास का एक दूसरा पक्ष भी है, जहां कलाकार अपने समय के नैतिक साक्षी के रूप में उपस्थित होते हैं। वे केवल चित्र नहीं बनाते, बल्कि अपने युग के दर्द, अन्याय, भूख, युद्ध और विस्थापन का दृश्य दस्तावेज तैयार करते हैं। दुर्भाग्यवश ऐसे कलाकारों को अक्सर अपने समय में वह सम्मान नहीं मिलता, जिसके वे अधिकारी होते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में चित्तप्रसाद और जैनुल आबेदीन ऐसे ही दो कलाकार रहे हैं, जिनकी कला ने 1943 के बंगाल अकाल की विभीषिका को अभूतपूर्व संवेदनशीलता और तीव्रता के साथ अभिव्यक्त किया। विडंबना यह है कि भारतीय आधुनिक कला के मुख्य आख्यानों में उन्हें वह स्थान बहुत देर से मिला, जिसके वे वास्तव में अधिकारी थे।
इस संदर्भ में वरिष्ठ कलाकार, लेखक और कला समीक्षक अशोक भौमिक का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने लेखन, व्याख्यानों और शोधपरक पुस्तकों के माध्यम से न केवल चित्तप्रसाद और जैनुल आबेदीन के कार्यों को पुनः चर्चा के केंद्र में लाने का सफल प्रयास किया, बल्कि भारतीय आधुनिक कला इतिहास में उनके कलात्मक और वैचारिक हस्तक्षेप को भी रेखांकित किया। एक अर्थ में यह कार्य भारतीय कला इतिहास की स्मृतिहीनता के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। बंगाल स्कूल के संदर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उसके सभी कलाकार सामाजिक यथार्थ से पूरी तरह विमुख नहीं थे, उदाहरणार्थ नंदलाल बोस और उनके कुछ शिष्यों के कार्यों में ग्रामीण जीवन और सामाजिक सरोकार भी दिखाई देते हैं। किंतु कहीं न कहीं यहां उनकी प्राथमिकता में ग्रामीण सौंदर्य की अभिव्यक्ति जितनी मुखर रही, वैसी तीव्रता ग्रामीण जीवन में व्याप्त अभाव और भूख से जुड़ी चिंताओं को सामने लाने में नहीं दिखती है। वहीं कुछ मायनों में जैनुल आबेदीन को पूरी तरह उपेक्षित कलाकार कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान और बाद के बांग्लादेश में उन्हें राष्ट्रीय कलाकार का दर्जा प्राप्त हुआ। किंतु उनकी उपेक्षा का यह प्रश्न मुख्यतः भारतीय आधुनिक कला इतिहास और अंतर्राष्ट्रीय कला-बाजार के संदर्भ में आज भी प्रासंगिक है।
अकाल के बीच कला का नैतिक हस्तक्षेप
दरअसल 1943 का बंगाल का अकाल केवल प्राकृतिक आपदा नहीं था। अनेक इतिहासकारों ने इसे औपनिवेशिक नीतियों, युद्धकालीन आपूर्ति व्यवस्था और प्रशासनिक विफलताओं का परिणाम माना है। लाखों लोग भूख, बीमारी और विस्थापन का शिकार हुए। सड़कों, रेलवे स्टेशनों और बाजारों में भूख से तड़पते मनुष्यों की उपस्थिति उस समय के सामाजिक यथार्थ का हिस्सा थी।
इसी दौर में जैनुल आबेदीन और चित्तप्रसाद ने अपनी कला को इस मानवीय त्रासदी का साक्ष्य बनाया। जैनुल आबेदीन की अकाल-श्रृंखला में दिखाई देने वाले कंकालवत शरीर, भूख से सूख चुके चेहरे और निराशा से भरी आंखें केवल चित्र नहीं हैं, वे इतिहास की ऐसी दृश्य गवाही हैं, जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। दूसरी ओर चित्तप्रसाद ने अपने रेखाचित्रों और प्रसिद्ध प्रकाशन “भूखा बंगाल” के माध्यम से अकाल को राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में प्रस्तुत किया। इस दौरान रची गई उनकी कलाकृतियों में भूख केवल मानवीय दुख नहीं, बल्कि सत्ता-संरचनाओं की विफलता का प्रमाण भी है।
इन दोनों कलाकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अकाल को किसी रोमानी या करुणामूलक दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि उन्होंने पीड़ित मनुष्य को इतिहास के केंद्र में स्थापित किया। उनकी कला में किसान, मजदूर, स्त्री, बच्चा और भूखा मनुष्य पहली बार इतने स्पष्ट रूप से उपस्थित हुए।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आता है। जब बंगाल में अकाल जैसी भीषण त्रासदी घटित हो रही थी, तब बंगाल के अनेक प्रतिष्ठित कलाकार किस प्रकार की कला रच रहे थे? विदित हो कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में बंगाल स्कूल भारतीय कला के पुनर्जागरण का प्रमुख केंद्र बन गया था। अबनीन्द्रनाथ ठाकुर, नंदलाल बोस और उनके उत्तराधिकारियों ने औपनिवेशिक अकादमिक कला के विरुद्ध भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता की खोज की।
जाहिर है यह आंदोलन भारतीय कला के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था। क्योंकि इसने भारतीय चित्रकला को एक नई वैचारिक दिशा प्रदान की थी। किंतु 1940 के दशक तक आते-आते इस आंदोलन का बड़ा हिस्सा मिथकीय, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विषयों की ओर उन्मुख हो चुका था।
परिणामस्वरूप जब समाज भूख और विस्थापन के संकट से गुजर रहा था, तब भारतीय कलाकारों का एक बड़ा वर्ग अतीत, प्रतीक और सांस्कृतिक गौरव गान में व्यस्त दिखाई देता है। यहीं चित्तप्रसाद और जैनुल आबेदीन का महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि उन्होंने राष्ट्रवाद की अमूर्त अवधारणाओं के बजाय वास्तविक मनुष्य को केंद्र में रखा। इसीलिए अपनी कृतियों में वे भारत की सांस्कृतिक आत्मा को नहीं, बल्कि भारत के भूखे नागरिकों को चित्रित कर रहे थे। संभवतः यही कारण है कि उनकी कला अपने समय के धनाढ्य और प्रभुत्वशाली वर्ग के लिए असुविधाजनक भी थी।
