लखनऊ कोचिंग अग्निकांड के सवालों पर सन्नाटा
लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग ने केवल 15 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि व्यवस्था के खोखले दावों को भी राख कर दिया। सवाल यह है कि हर त्रासदी के बाद भी जिम्मेदार कैसे बच जाते हैं और हमेशा बेगुनाह ही क्यों मरते हैं?
लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में एक कोचिंग सेंटर में लगी आग में 15 मासूम जिंदगियों का बुझ जाना केवल एक दुखद घटना नहीं है, बल्कि यह उस सड़ी-गली व्यवस्था का आईना है, जो हर बार इंसानी जानों की कीमत पर अपनी लापरवाही को ढकने की कोशिश करती है। दम घुटने से बाथरूम में छिपे छात्रों की मौत, छज्जों से कूदकर जान बचाने की कोशिश करते युवा, बंद दरवाजों में कैद उम्मीदें, ये दृश्य किसी दुर्घटना के नहीं, बल्कि एक सुनियोजित विफलता के हैं। सवाल यह है कि क्या यह महज हादसा है या 15 निर्दोष विद्यार्थियों की सामूहिक हत्या?
लखनऊ की इस घटना को यदि अलग-थलग देखा जाए तो हम सच्चाई से आंखें मूंद लेंगे। यह घटना उसी श्रृंखला की एक कड़ी है, जिसमें कुछ ही दिन पहले दिल्ली के मालवीय नगर में 21 लोगों की मौत हुई थी और उससे पहले भी दिल्ली के मुंडका, करोल बाग, अनाज मंडी, उपहार सिनेमा तथा देश के विभिन्न हिस्सों में न जाने कितने अग्निकांडों में सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। हर बार कहानी एक जैसी होती है, अवैध निर्माण, फायर एनओसी का अभाव, बंद निकास द्वार या एक ही प्रवेश और निकास द्वार, भीड़भाड़ वाली इमारतें और प्रशासन की आंखों पर बंधी मिलीभगत की पट्टी।
लखनऊ अग्निकांड के शुरुआती तथ्यों ने एक बार फिर वही सच्चाई उजागर की है। जिस इमारत में आग लगी, उसका नक्शा तो पास था, लेकिन निर्माण उसके विपरीत किया गया। सेटबैक तक को कवर कर लिया गया। नीचे पेट शॉप और गेमिंग जोन, ऊपर कोचिंग और लाइब्रेरी यानी एक ही इमारत में बिना सुरक्षा मानकों के कई तरह की गतिविधियां। सबसे गंभीर तथ्य यह कि कोचिंग का दरवाजा बंद था, जिससे छात्र बाहर नहीं निकल सके। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक उपेक्षा है। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि आखिर ऐसी इमारतें बन कैसे जाती हैं? क्या प्रशासन को पता नहीं होता? क्या बिजली विभाग, नगर निगम, फायर विभाग, पुलिस, इनमें से किसी को भी जानकारी नहीं होती? सच यह है कि सबको जानकारी होती है, लेकिन व्यवस्था की मिलीभगत और भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि नियम केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं।
जब कोई अवैध इमारत बनती है तो उसकी नींव खोदी जाती है, दीवारें खड़ी होती हैं, लेंटर डलता है। उस दौरान स्थानीय नगर निगम, विकास प्राधिकरण और पुलिस के अफसर कहां सो रहे होते हैं? क्या उनकी आंखों के सामने यह निर्माण नहीं होता? जिस इमारत के पास फायर सेफ्टी का सर्टिफिकेट (फायर एनओसी) नहीं है, उसे बिजली विभाग कमर्शियल कनेक्शन कैसे दे देता है? जल संस्थान पानी का कनेक्शन कैसे जारी करता है? गंभीर प्रश्न यह है कि एक ही संकरी इमारत में नीचे गेमिंग जोन और ऊपर सैंकड़ों बच्चों की कोचिंग चलाने की अनुमति किस कानून के तहत दी गई? क्या प्रशासन को नहीं पता कि ऐसी जगहों पर पैर रखने की जगह नहीं होती? सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ऐसे किसी भी मामले में बड़े अधिकारियों पर गाज क्यों नहीं गिरती? सस्पेंशन हमेशा छोटे कर्मचारियों का ही क्यों होता है? उस क्षेत्र के तत्कालीन अवैध निर्माण प्रभारी, जोनल कमिश्नर या मुख्य अग्निशमन अधिकारी को जेल की सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा जाता?
भारत के शहरों में निर्माण की प्रक्रिया एक दिन में पूरी नहीं होती। पहले जमीन का उपयोग बदलता है, फिर नक्शा पास होता है, फिर धीरे-धीरे निर्माण होता है, बिजली-पानी के कनेक्शन मिलते हैं और अंततः व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में दर्जनों अधिकारी और विभाग शामिल होते हैं। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन अनजान था, वास्तविकता से मुंह चुराना है। सच्चाई यह है कि यह सब कुछ प्रशासन और बिल्डर-व्यापारियों की सांठगांठ से होता है। दिल्ली के मालवीय नगर की घटना में भी यही सामने आया था कि छह कमरों की अनुमति के बावजूद 25 से अधिक कमरे बनाए गए थे। केवल एक निकास मार्ग था और वह भी प्रभावी नहीं था। बेसमेंट का गेट बंद था। आग लगने के बाद लोग बाहर नहीं निकल सके थे।
यह वही कहानी है, जो 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड में देखी गई थी, जहां बंद निकास द्वारों के कारण 59 लोगों की जान गई थी। इतिहास गवाह है कि हर बड़े अग्निकांड के बाद सख्त नियमों की बात होती है, जांच आयोग बनते हैं, मुआवजे घोषित होते हैं और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया जाता है, लेकिन क्या कभी किसी बड़े अधिकारी को सजा मिली? क्या कभी ऐसी कार्रवाई हुई, जिससे भविष्य में कोई नियमों की अनदेखी करने की हिम्मत न करे? जवाब स्पष्ट है, नहीं।
लखनऊ और दिल्ली की घटनाएं साफतौर पर बताती हैं कि हमारी व्यवस्था केवल प्रतिक्रियात्मक है, सक्रिय नहीं। जब तक हादसा नहीं होता, तब तक कोई कार्रवाई नहीं होती और जब हादसा हो जाता है, तब केवल औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। यह एक ऐसा चक्र बन चुका है, जिसमें हर बार आम आदमी की जान जाती है और व्यवस्था बच निकलती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज शहरों में हजारों ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जो किसी भी समय मौत का जाल बन सकती हैं।
संकरी गलियों में बहुमंजिला इमारतें, बेसमेंट में अवैध फैक्ट्रियां, बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, बंद खिड़कियां, लोहे की ग्रिलें और केवल एक प्रवेश-निकास द्वार, ये सब मिलकर एक ऐसी त्रासदी को जन्म देने के लिए पर्याप्त हैं, जो किसी भी दिन सामने आ सकती है। फायर सेफ्टी के उपकरण अक्सर केवल दिखावे के लिए लगाए जाते हैं। कई जगह तो ये उपकरण काम ही नहीं करते। आपातकालीन निकास कागजों में तो होते हैं, लेकिन वास्तविकता में बंद या अवरुद्ध पाए जाते हैं। दमकल विभाग की गाड़ियां अक्सर संकरी गलियों के कारण घटना स्थल तक पहुंच ही नहीं पाती। ऐसे में जब आग लगती है, तो वह केवल इमारत को नहीं बल्कि इंसानी उम्मीदों को भी जलाकर राख कर देती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
