प्रेरक कथा : विषयों में दुर्गंध

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Published By Anjali Singh
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एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।

घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच गए और वहा एक पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए। पास के घरों में चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था, तो कहीं नया चमड़ा सिद्ध किया जा रहा था। हर घर में चमड़ा था और उसमें से बडी दुर्गंध आ रही थी। वायु प्रवाह भी उधर ही था। दुर्गंध के मारे राजा की नाक फटने लगी। 

उन्होंने महात्माजी से कहा, “भगवन! दुर्गंध के कारण खड़ा नहीं रहा जाता, कृपया यहां से चलें।” महात्माजी बोले, “तुम्हीं को दुर्गंध आती है? देखो आसपास के घरों की ओर, कितने पुरुष, स्त्रियां और बाल-बच्चे हैं। कोई कार्य कर रहें हैं, कोई खा-पी रहे हैं, सब हंस-खेल रहे हैं। किसी को तो दुर्गंध नहीं आती, मात्र तुम्हीं को दुर्गंध आ रही है।” राजा ने कहा, “भगवन! चमड़े से कमाते-कमाते तथा चमड़े में रहते-रहते इनका अभ्यास हो गया है।

इनकी नाक ही ऐसी हो गई है कि इन्हें चमड़े की दुर्गंध नहीं आती, परंतु मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हूं। अतः शीघ्र चलें, अब तो एक क्षण भी यहां नहीं ठहरा जाता।” महात्मा ने हंसकर कहा, “राजन, यही दशा तुम्हारे राज प्रासाद की भी है। विषय भोगों में रहते-रहते तुम्हें उनमें दुर्गंध नहीं आती है, तुम्हें अभ्यास हो गया है, परंतु मुझको तो ये सांसारिक विषय भोग देखते ही उल्टी-सी आती है। इसी से मैं तुम्हारे घर नहीं जाता था।” राजा ने रहस्य समझ लिया था, जो महात्मा हंसकर राजा को साथ लिए वहां से चल दिए।


प्रमोद श्रीवास्तव