परमात्मा के प्रतीक थे कबीर के राम
सदियों बीत जाने के बाद भी आज कबीर इसलिए याद आते हैं कि उन्होंने मानव और मानव समाज के लिए जो कुछ भी कहा वह जात-पांत, धर्म से ऊपर उठकर हर एक मानव के हित में कहा। आज के क्रूर समय में कबीर अपनी जनपक्षधर्ता, मानव-प्रेम, पावन चिंतन, सुधारवादी दृष्टिकोण तथा अप्रतिम निर्गुण भक्ति के लिए याद किए जाते हैं और इन्हीं कारणों से प्रासंगिक भी बने हुए हैं। जब-जब समाज धार्मिक हिंसा, द्वेष, धार्मिक आडंबर, पाखंड आदि से संत्रस्त होता है, तो हमें कबीर की ज़रूरत महसूस होती है। परमात्मा से उनका नाता जितना प्रबल था, उतना ही गहरा रिश्ता उनका मानव से भी था। लोक कल्याण की भावना से भरकर वे कहते हैं..
कबिरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।
ज्ञानाश्रयी भक्ति परंपरा के महान संत, कबीरदास न केवल एक महान कवि थे, बल्कि श्रेष्ठ मानवतावादी विचारक एवं समाजसुधारक थे, जिन्होंने तत्कालीन समाज में फैले धर्म के बाह्याडंबरों और कट्टरता को जड़ से मिटाने का प्रयास किया। उनकी वाणी में उनकी निर्गुण भक्ति की अलौकिक अनुभूतियां और उनके लोक कल्याणकारी विचार निहित हैं, जो साहित्य और संस्कृति की अनमोल निधियां हैं। वे आचरण से निर्गुणमार्गी संत, अंतरात्मा से भक्त, हृदय से कवि और स्वभाववश समाज सुधारक थे। उनका जीवन अनेक विरोधाभासों से भरा हुआ था। विधवा ब्राह्मणी के पुत्र होकर जुलाहे के यहां पले। निरक्षर होते हुए भी कबीर ज्ञानियों को ज्ञान देने वाले गुरु थे। रामानंद के शिष्य होकर भी उनकी राम की अवधारणा भिन्न थी। उनके राम दशरथी राम न होकर परमात्मा के प्रतीक थे।
उनकी परंपराभंजक विचारधाराएं उन्हें एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व सिद्ध करती हैं। उनकी स्पष्टवादिता का भी कोई मुकाबला नहीं था। धार्मिक कट्टरता एवं कुरीतियों का विरोध उनकी वाणी और विचार का वह व्यावहारिक पक्ष था, जो समाजिक विषमता को दूर करने और सभी जातियों एवं धर्मों, हिंदुओं और मुसलमानों को एक सूत्र में बांधने वाला सिद्ध हुआ, इसीलिए उनकी कालजयी वाणी आज भी मानव का मार्गदर्शन कर रही है। काल की आंधी उन्हें उड़ा नहीं पाई, उल्टे समय के साथ-साथ वे और भी अधिक प्रासंगिक होते चले गए।
कबीर अपने को न हिंदू मानते थे और न मुसलमान। स्वयं को बार-बार जुलाहा कहते रहे। ऐसा कहने में उन्हें कोई लज्जा नहीं थी, लेकिन उन्होंने समाज की पूज्य जातियों को कोई अहमियत भी नहीं दी; क्योंकि जात-पांत में उनका विश्वास नहीं था। उनकी दृष्टि में विद्वता की कसौटी आत्मज्ञान थी और शुद्धता की कसौटी जाति नहीं, सदाचार थी। उनका गहन विश्वास था कि जीवन को सही ढंग से जीना और बेदाग रखना जरूरी है, तभी मानव-जीवन सार्थक हो सकता है। इसीलिए उन्होंने कहा,
सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों-की-त्यों धर दीनी चदरिया।
वे मनुष्य को ब्राह्मण या क्षत्रिय, सैयद या शेख, शूद्र या वैश्य के खेमे में नहीं बांटते थे, वरन् उसे उसके कर्मों से जांचते थे, इसीलिए कबीर जो आध्यात्मिक-मुक्ति का मार्ग तैयार करते हैं, वह सदाचार से प्रारंभ होकर आत्मिक मुक्ति तक जाता है। कबीर के समय में भी समाज झूठ, पाखंड, अन्याय, अत्याचार और कुटिलता से भरा हुआ था, जिसके कारण उन्हें धर्म से पहले आचरण-शुद्धि और आत्मज्ञान की बात उठानी पड़ी थी। कबीर का समय भी सामाजिक भेदभाव, आर्थिक विषमता और घोर धार्मिक बाह्याडंबरों का काल था, जिसके कारण कबीर को कहना पड़ा-
मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा।
आसन मारि मंदिर में बैठे
नाम छांड़ी पूजन लागे पतरा। (ये लेखिका के निजी विचार हैं)
