युवाओं के लिए घर खरीदना बन रहा सपना

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Published By Deepak Mishra
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आज दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में घरों की कीमतें पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न रियल एस्टेट रिपोर्टों के अनुसार 2020 के बाद कई प्रमुख शहरों में आवासीय कीमतों में 25 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है।

रजत मेहरोत्रा, वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ
रजत मेहरोत्रा, वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

 

भारत में एक समय ऐसा था जब नौकरी लगते ही परिवार का पहला सपना होता था- ‘अपना घर’, लेकिन आज की युवा पीढ़ी के लिए घर खरीदना केवल सपना बनकर रह गया है। बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतें, ऊंची ब्याज दरें, महंगी जमीन, कम वेतन वृद्धि और बढ़ती जीवनशैली लागत ने भारतीय युवाओं के लिए रियल एस्टेट को लगभग पहुंच से बाहर कर दिया है। स्थिति यह है कि बड़े शहरों में एक सामान्य मध्यम वर्गीय व्यक्ति की पूरी उम्र की बचत भी छोटा फ्लैट खरीदने में समाप्त हो सकती है।

आज दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में घरों की कीमतें पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न रियल एस्टेट रिपोर्टों के अनुसार 2020 के बाद कई प्रमुख शहरों में आवासीय कीमतों में 25 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। वहीं दूसरी ओर युवाओं की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। परिणामस्वरूप ‘होम अफोर्डेबिलिटी’ यानी घर खरीदने की क्षमता लगातार कमजोर हो रही है। सबसे बड़ी समस्या बढ़ती ब्याज दरें हैं।

कोविड के बाद महंगाई को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई ने रेपो रेट में कई बार बढ़ोतरी की। इसका सीधा असर होम लोन की ईएमआई पर पड़ा। जो ईएमआई कुछ साल पहले 25-30 हजार रुपये थी, वही अब 45-60 हजार रुपये तक पहुंच गई है। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इतनी बड़ी मासिक किस्त देना आसान नहीं है, विशेषकर तब जब शिक्षा, स्वास्थ्य, पेट्रोल, बिजली और दैनिक खर्च लगातार महंगे हो रहे हों।

इसके अलावा, भारत में जमीन की कीमतों में असामान्य वृद्धि भी चिंता का विषय है। बड़े शहरों में जमीन सीमित है, लेकिन मांग लगातार बढ़ रही है। इसके कारण बिल्डर और निवेशक जमीनों को लंबे समय तक रोककर रखते हैं, जिससे कृत्रिम कमी पैदा होती है और कीमतें और बढ़ जाती हैं। कई स्थानों पर वास्तविक मांग से ज्यादा निवेश आधारित खरीदारी हो रही है।

इसका नुकसान आम खरीदार को उठाना पड़ता है। युवाओं की रोजगार स्थिति भी इस संकट को और गंभीर बना रही है। निजी क्षेत्र में नौकरी की अनिश्चितता बढ़ रही है। स्टार्टअप और आईटी सेक्टर में छंटनी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे माहौल में 20-30 साल के लंबे होम लोन का जोखिम लेना युवाओं के लिए मानसिक और आर्थिक दोनों रूप से कठिन हो गया है। कई युवा अब ‘घर खरीदने’ के बजाय ‘किराए पर रहने’ को बेहतर विकल्प मानने लगे हैं।

एक और महत्वपूर्ण कारण है भारत में बढ़ती महंगी जीवनशैली। आज की युवा पीढ़ी शिक्षा ऋण, वाहन ऋण, क्रेडिट कार्ड भुगतान और व्यक्तिगत खर्चों के दबाव में पहले से ही जूझ रही है। बड़े शहरों में किराया, ट्रांसपोर्ट, स्वास्थ्य बीमा और बच्चों की शिक्षा का खर्च इतना अधिक हो चुका है कि बचत करना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में घर के डाउन पेमेंट के लिए लाखों रुपये जुटाना बहुत कठिन कार्य बन गया है।

रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता की कमी भी आम लोगों की परेशानी बढ़ाती है। कई परियोजनाओं में देरी, कानूनी विवाद, अधूरी सुविधाएं और बिल्डरों की वित्तीय समस्याएं खरीदारों का भरोसा कमजोर करती हैं, हालांकि RERA जैसे कानूनों ने स्थिति सुधारने की कोशिश की है, लेकिन अभी भी कई छोटे शहरों और परियोजनाओं में पारदर्शिता की कमी बनी हुई है।

भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। गांवों और छोटे शहरों से रोजगार की तलाश में लाखों लोग महानगरों की ओर जा रहे हैं। इससे शहरों में आवास की मांग और अधिक बढ़ रही है, लेकिन सस्ते और किफायती घरों की आपूर्ति उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। यही कारण है कि ‘अफोर्डेबल हाउसिंग’ आज भारत की सबसे बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों में से एक बनती जा रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यही स्थिति जारी रही, तो भविष्य में भारत में ‘जनरेशन रेंट’ का दौर शुरू हो सकता है, जहां पूरी एक पीढ़ी जीवनभर किराए के घरों में रहने को मजबूर होगी। इसका असर केवल व्यक्तिगत जीवन पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। जब लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा ईएमआई या किराए में खर्च करेंगे, तब उनकी बचत और निवेश क्षमता घटेगी।

इससे उपभोग, निवेश और आर्थिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। सरकार के लिए यह समय गंभीरता से सोचने का है। केवल लग्जरी और हाई-एंड प्रोजेक्ट्स से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार को सस्ते घरों की आपूर्ति बढ़ाने, भूमि सुधार, सस्ती ब्याज दरों वाले होम लोन और शहरी नियोजन पर अधिक ध्यान देना होगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं) 

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