Work From Home Side Effects: घर से काम करने की चाहत कहीं आपको बना न दें मेंटली अनहेल्दी? रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा
58% ज्यादा अकेलेपन के शिकार, एंग्जायटी और डिप्रेशन का बढ़ा खतरा
नई दिल्ली: कोविड-19 महामारी के दौर ने दुनिया भर की कार्यसंस्कृति को पूरी तरह बदल दिया था। उस संकट काल में व्यवसायों को चालू रखने और नौकरियों को बचाने के लिए शुरू हुआ 'वर्क फ्रॉम होम' (WFH) का चलन आज करोड़ों कामकाजी लोगों की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। दफ्तर आने-जाने के तनाव से मुक्ति, समय की बचत और काम में (फ्लेक्सिबिलिटी जैसी खूबियों के कारण आज भी एक बड़ा वर्ग घर से काम करने को प्राथमिकता देता है। यहाँ तक कि लोग इस सुविधा के बदले अपनी तनख्वाह में 4 से 10 फीसदी तक की कटौती सहने को भी तैयार हैं।
लेकिन, क्या घर की चारदीवारी से काम करना वाकई हर लिहाज से फायदेमंद है? 'जर्नल साइंस' में प्रकाशित न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व बैंक की अर्थशास्त्री नतालिया इमैनुएल और उनकी टीम की एक हालिया रिसर्च ने इस सिक्के के दूसरे और बेहद चिंताजनक पहलू को उजागर किया है।
अकेलेपन में 58% का इजाफा और सामाजिक अलगाव
शोधकर्ताओं ने अमेरिकी नागरिकों पर हुए पांच बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर दो श्रेणियों की नौकरियों का तुलनात्मक अध्ययन किया। पहली 'रिमोटेबल जॉब्स' (जैसे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, आईटी और डिजिटल मार्केटिंग) और दूसरी 'नॉन-रिमोटेबल जॉब्स' (जैसे सर्जरी या मैकेनिकल इंजीनियरिंग, जिन्हें फील्ड पर जाकर ही किया जा सकता है)।
नतीजे चौंकाने वाले थे। घर से काम करने वाले लोगों के अकेले समय बिताने के घंटों में 58 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी देखी गई। वहीं, पूरे दिन में किसी भी अन्य इंसान के सीधे संपर्क में न आने की संभावना 72% तक बढ़ गई। इसका मतलब यह है कि लोगों का पूरा दिन बिना किसी से आमने-सामने बात किए, यहाँ तक कि किसी से हाथ मिलाए या साधारण दुआ-सलामी किए बिना ही बीत रहा है।
काम के बाद भी नहीं सुधर रहे हालात
इस अध्ययन का एक और कड़वा सच यह सामने आया कि दफ्तर न जाने से जो सामाजिक दायरा सिकुड़ रहा है, लोग दफ्तर के समय के बाद भी उसकी भरपाई नहीं कर पा रहे हैं। काम खत्म होने के बाद भी कर्मचारी दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलने के बजाय अकेले ही समय बिता रहे हैं।
मेंटल और फिजिकल हेल्स पर सीधा प्रहार
अकेलेपन के इस बढ़ते जाल के कारण एंप्लाइज में एंग्जायटी, डिप्रेशन और मेंटल टेंशन के मामले तेजी से बढ़े हैं। यही वजह है कि साइकेट्रिस्ट के पास जाने वाले कामकाजी लोगों और मनोरोग से जुड़ी दवाइयों के इस्तेमाल में भारी उछाल आया है। जो लोग अकेले रहते हैं, उन पर इसका असर दोगुना बदतर देखा गया है, जहाँ किसी से भी संपर्क न होने का जोखिम 83% तक बढ़ जाता है।
'यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो' के बिहेवियरल साइंस के प्रोफेसर निकोलस एप्ली के अनुसार, लोग रोजाना के ट्रैफिक और सफर की तात्कालिक परेशानी से बचने के लिए अनजाने में अपने मानसिक स्वास्थ्य का बड़ा नुकसान कर रहे हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और वह आमने-सामने की बातचीत से मिलने वाले मानसिक सुकून को बेहद कम आंकता है। लंबे समय तक सामाजिक रूप से कटे रहने का असर केवल दिमाग पर ही नहीं, बल्कि कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) और हृदय की कार्यप्रणाली के रूप में शरीर पर भी पड़ता है।
छोटी बातचीत का बड़ा महत्व
ससेक्स यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक गिलियन सैंडस्ट्रॉम का मानना है कि रोजमर्रा की जिंदगी में अजनबियों या पड़ोसियों से होने वाली छोटी-छोटी बातचीत भी मानसिक संतुलन बनाए रखने में दवा की तरह काम करती है। वे स्वयं भी रिमोट वर्क करती हैं, लेकिन इसके दुष्प्रभावों से बचने के लिए नियमित रूप से बाहर टहलने जाती हैं, खेल गतिविधियों में भाग लेती हैं और लोगों से मिलती-जुलती हैं।
क्या है इसका समाधान?
विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि इस शोध का उद्देश्य कंपनियों को जबरन कर्मचारियों को दफ्तर बुलाने के लिए प्रेरित करना नहीं है। बल्कि, कंपनियों को हाइब्रिड मॉडल या ऐसा कार्यालय परिवेश तैयार करने की आवश्यकता है जहाँ कर्मचारी सहकर्मियों से मिल सकें, खुलकर संवाद कर सकें और एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण का हिस्सा बन सकें ताकि उत्पादकता के साथ-साथ उनका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहे।
