बच्चों की झूठ बोलने की आदत: डांट-फटकार नहीं, धैर्य और सही 'पैरेंटिंग' से सिखाएं ईमानदारी का पाठ

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
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लखनऊः आज के समय में बच्चों की परवरिश माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और तकनीक के प्रभाव के बीच बच्चों के व्यवहार में भी कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। इन्हीं में से एक है छोटी-छोटी बातों पर झूठ बोलने की आदत। कभी होमवर्क पूरा न करने पर, कभी गलती छिपाने के लिए तो कभी डांट या सजा के डर से बच्चे सच बताने से बचने लगते हैं। यह स्थिति कई अभिभावकों को परेशान कर देती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के झूठ बोलने की आदत को केवल डांट-फटकार से नहीं, बल्कि धैर्य, समझदारी और सही मार्गदर्शन से सुधारा जा सकता है। यदि माता-पिता समय रहते कारणों को समझ लें और उचित व्यवहार अपनाएं, तो बच्चे धीरे-धीरे ईमानदारी की ओर बढ़ सकते हैं।

गुस्से के बजाय शांत तरीके से करें बात

जब बच्चा झूठ बोलते हुए पकड़ा जाए, तो अधिकांश माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया गुस्सा होती है। वे डांटने या सजा देने लगते हैं, लेकिन ऐसा करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चे अक्सर इसलिए झूठ बोलते हैं, क्योंकि उन्हें सच बताने पर डांट या दंड का डर होता है। ऐसे में यदि माता-पिता शांत रहकर उसकी बात सुनें और समझने की कोशिश करें कि उसने झूठ क्यों बोला, तो बच्चा अधिक सहज महसूस करेगा। उसे यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि सच बोलने पर उसकी बात सुनी जाएगी और उसे समझा जाएगा। इससे उसके मन का डर कम होगा और वह भविष्य में सच बोलने के लिए अधिक तैयार रहेगा। 

सच बोलने पर करें तारीफ

बच्चों में सकारात्मक व्यवहार विकसित करने का सबसे प्रभावी तरीका उनकी सराहना करना है। जब बच्चा अपनी गलती स्वीकार कर ले या किसी मुश्किल स्थिति में सच बोलने का साहस दिखाए, तो उसकी प्रशंसा अवश्य करें। इससे उसे यह महसूस होगा कि ईमानदारी एक अच्छी बात है और उसके प्रयासों को महत्व दिया जा रहा है। हर बार बड़ी उपलब्धि पर ही नहीं, बल्कि छोटी-छोटी ईमानदार बातों पर भी उसकी तारीफ करनी चाहिए। इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह समझता है कि सच बोलने से सम्मान मिलता है, जबकि झूठ केवल अस्थायी राहत देता है।

ईमानदारी का बनें उदाहरण

कहते हैं कि घर ही बच्चों की प्रथम पाठशाला होती है। बच्चों के लिए माता-पिता सबसे बड़े आदर्श होते हैं। वे केवल सीखने से नहीं, बल्कि देखकर भी बहुत कुछ अपनाते हैं। यदि घर के बड़े लोग छोटी-छोटी बातों में झूठ बोलते हैं, बहाने बनाते हैं या सच को छिपाते हैं, तो बच्चे भी इसे सामान्य व्यवहार मान सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि माता-पिता किसी फोन कॉल से बचने के लिए बच्चे से कहें कि ‘बोल दो मैं घर पर नहीं हूं’, तो यह संदेश बच्चे के मन में जाता है कि जरूरत पड़ने पर झूठ बोलना स्वीकार्य है। इसलिए अभिभावकों को अपने व्यवहार में ईमानदारी दिखानी चाहिए। घर का माहौल जितना अधिक पारदर्शी और विश्वासपूर्ण होगा, बच्चों में भी सच बोलने की प्रवृत्ति उतनी ही मजबूत होगी।

धैर्य और भरोसा 

कोई भी आदत एक दिन में विकसित नहीं होती है। उसी तरह बच्चों में ईमानदारी की आदत एक दिन में विकसित नहीं हो सकती है। इसके लिए माता-पिता को लगातार धैर्य, प्रेम और सकारात्मक मार्गदर्शन की परम आवश्यकता होती है। यदि घर का वातावरण ऐसा हो, जहां बच्चा बिना डर और झिझक के अपनी बात कह सके, तो उसके झूठ बोलने की संभावना काफी कम हो जाती है। बच्चों को यह एहसास दिलाना जरूरी है कि गलती करना बुरा नहीं है, लेकिन उसे छिपाने के लिए झूठ बोलना सही नहीं है। प्यार, संवाद और विश्वास के माध्यम से ही बच्चों को सच बोलने का महत्व सिखाया जा सकता है और उन्हें एक जिम्मेदार एवं ईमानदार व्यक्तित्व की ओर बढ़ाया जा सकता है।

सच और झूठ का समझाएं फर्क

बच्चों को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि झूठ बोलना गलत है। उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि सच बोलना क्यों महत्वपूर्ण है। इसके लिए कहानियों, प्रेरक प्रसंगों और दैनिक जीवन के उदाहरणों का सहारा लिया जा सकता है। बच्चों को बताएं कि झूठ से लोगों का विश्वास टूट सकता है और रिश्तों में दूरी आ सकती है। वहीं सच बोलने से भरोसा मजबूत होता है और व्यक्ति का चरित्र बेहतर बनता है। जब बच्चे सच और झूठ के परिणामों को समझने लगते हैं, तो वे स्वयं सही रास्ता चुनने की कोशिश करते हैं। 

बच्चे झूठ क्यों बोलते हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के झूठ बोलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। कुछ बच्चे सजा से बचने के लिए झूठ बोलते हैं, जबकि कुछ माता-पिता या दोस्तों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा करते हैं। कम उम्र के बच्चों में कल्पनाशीलता भी एक कारण हो सकती है, जहां वे वास्तविकता और कल्पना के बीच का अंतर पूरी तरह नहीं समझ पाते। कभी-कभी आत्मविश्वास की कमी या असफलता का डर भी उन्हें सच छिपाने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए हर झूठ को केवल गलत व्यवहार मानकर प्रतिक्रिया देने के बजाय उसके पीछे के कारण को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।

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