190 परमाणु हथियारों के साथ बढ़ी भारत की ताकत

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Published By Deepak Mishra
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‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की ‘ईयर बुक 2026’ ने संकेत दिया है कि भारत की परमाणु रणनीति नए चरण में प्रवेश कर रही है। देश का कुल परमाणु शस्त्रागार बढ़कर 190 वॉरहेड्स तक पहुंच गया है।

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योगेश कुमार गोयल,
वरिष्ठ पत्रकार

 

‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (सीपरी) की ‘ईयर बुक 2026’ ने संकेत दिया है कि भारत की परमाणु रणनीति एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने पहली बार शांति काल में 12 परमाणु हथियारों को तैनात स्थिति में रखा है और उसका कुल परमाणु शस्त्रागार बढ़कर 190 वॉरहेड्स तक पहुंच गया है।

यह केवल संख्या में वृद्धि नहीं, बल्कि भारत की सामरिक सोच और परिचालन क्षमता में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत का परमाणु भंडार पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। वर्ष 2024-25 के दौरान जहां भारत के पास लगभग 180 परमाणु हथियार होने का अनुमान था, वहीं अब यह संख्या 190 तक पहुंच गई है। 

दूसरी ओर पाकिस्तान का परमाणु भंडार 170 वॉरहेड्स पर स्थिर बना हुआ है। इस प्रकार पहली बार भारत ने परमाणु हथियारों की संख्या के मामले में पाकिस्तान पर उल्लेखनीय बढ़त बना ली है। स्टॉकहोम स्थित ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान’ के एक अध्ययन के मुताबिक, जनवरी 2021 तक भारत के पास केवल 156 परमाणु हथियार मौजूद थे जबकि पाकिस्तान और चीन के पास इनकी संख्या क्रमशः 165 और 350 थी।

परमाणु रणनीति में केवल संख्या ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि हथियारों की गुणवत्ता, उनकी तैनाती, प्रहार क्षमता और जवाबी हमले की विश्वसनीयता कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। भारत की परमाणु नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने सामान्य परिस्थितियों में परमाणु हथियारों और उन्हें ले जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों को अलग-अलग सुरक्षित भंडारों में रखा।

इसका उद्देश्य आकस्मिक या अनाधिकृत उपयोग की संभावना को न्यूनतम रखना था। सीपरी की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भारत अब सीमित संख्या मंक परमाणु हथियारों को ऑपरेशनल तैनाती की स्थिति में रखने लगा है, अर्थात् कुछ वॉरहेड्स अब केवल गोदामों में सुरक्षित नहीं हैं, बल्कि ऐसी स्थिति में रखे गए हैं कि आवश्यकता पड़ने पर उनका उपयोग अपेक्षाकृत कम समय में किया जा सके।

यह परिवर्तन भारत की घोषित ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति के परित्याग का संकेत नहीं है। भारत ने अब तक अपनी इस नीति में कोई औपचारिक बदलाव नहीं किया है। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि यदि किसी प्रतिद्वंद्वी द्वारा भारत पर परमाणु हमला किया जाता है, तो भारत की जवाबी कार्रवाई पहले की तुलना में अधिक तीव्र और विश्वसनीय हो सकती है। रणनीतिक विशेषज्ञ इसे प्रतिरोधक क्षमता की मजबूती के रूप में देखते हैं, क्योंकि परमाणु हथियारों का मूल उद्देश्य युद्ध लड़ना नहीं बल्कि युद्ध को रोकना होता है।

भारत के परमाणु आधुनिकीकरण कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन से जुड़ा हुआ है। पिछले एक दशक में चीन ने अपने परमाणु शस्त्रागार और मिसाइल क्षमताओं का तीव्र विस्तार किया है। सीपरी के अनुसार चीन का परमाणु भंडार बढ़कर लगभग 620 वॉरहेड्स तक पहुंच चुका है। 2020 की गलवान घाटी की घटना के बाद भारत-चीन संबंधों में उत्पन्न तनाव ने नई सामरिक चुनौतियां पैदा की हैं।

यही कारण है कि भारत अब ऐसी लंबी दूरी की मिसाइलों के विकास पर विशेष ध्यान दे रहा है, जिनकी पहुंच चीन के दूरस्थ क्षेत्रों तक हो। अग्नि-5 जैसी अंतरमहाद्वीपीय क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलें और भविष्य की उन्नत प्रणालियां इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा हैं। भारत की योजना केवल पाकिस्तान के संदर्भ में संतुलन बनाए रखने की नहीं, बल्कि चीन जैसी बड़ी शक्ति के विरुद्ध भी विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की है। यही वजह है कि भारत की परमाणु रणनीति अब दो मोर्चों वाली सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर विकसित की जा रही है।

भारत की बढ़ती परमाणु क्षमता का एक और महत्वपूर्ण आयाम उसकी समुद्री शक्ति है। आधुनिक परमाणु रणनीति में ‘सेकेंड स्ट्राइक कैपेसिटी’ अर्थात दुश्मन के पहले हमले के बाद भी प्रभावी जवाबी हमला करने की क्षमता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी संदर्भ में भारत की परमाणु पनडुब्बियां विशेष महत्व रखती हैं। आईएनएस अरिहंत और उसके बाद विकसित की गई परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां भारत की परमाणु त्रयी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही हैं। परमाणु त्रयी का अर्थ है कि किसी देश के पास भूमि, वायु और समुद्र तीनों माध्यमों से परमाणु हमला करने की क्षमता हो। 

भारत आज उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिन्होंने इस क्षमता को काफी हद तक विकसित कर लिया है। समुद्र में तैनात पनडुब्बियों को खोज पाना अत्यंत कठिन होता है, इसलिए वे किसी भी देश की प्रतिरोधक क्षमता को अधिक विश्वसनीय बनाती हैं। सीपरी की रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि भारत अब कुछ परमाणु हथियारों को बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों पर तैनात रखने लगा है। यह भारत की समुद्री परमाणु क्षमता में एक महत्वपूर्ण छलांग है। इससे भारत की सुरक्षा व्यवस्था अधिक लचीली और प्रभावी बनती है। 

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