मूल्यांकन पर सवाल और छात्रों का भविष्य

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

सीबीएसई के परिणाम घोषित होने के बाद लगभग चार लाख छात्रों ने अपनी स्कैन कॉपी देखने के लिए आवेदन किया। यह आंकड़ा अपने आप में छात्रों के असंतोष और बोर्ड की कार्यप्रणाली के बीच की खाई को दर्शाता है।

cats
विवेक सक्सेना,
अयोध्या

 

देश में कोई भी परीक्षा हो, उसमें विवाद होना गंभीर चिंता का विषय है। हालात ये होते जा रहे हैं कि बिना किसी विवाद के परीक्षा हो पाना अब एक दुर्लभ घटना सी होती जा रही है। हाल ही में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा 12वीं कक्षा के मूल्यांकन के लिए शुरू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली का संकट इसका नवीनतम और सबसे चिंताजनक उदाहरण है। जिस तकनीक को मूल्यांकन प्रक्रिया को तेज़, पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के दावे के साथ पेश किया गया था, वह आज लाखों छात्रों और अभिभावकों के लिए मानसिक प्रताड़ना का सबब बन चुकी है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या छात्रों के भविष्य से ऐसे ही खिलवाड़ होता रहेगा? ओएसएम प्रणाली में भारी तकनीकी गड़बड़ी मिलने पर सरकार ने सीबीएसई के अध्यक्ष राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता को तत्काल प्रभाव से हटा दिया। पूरे मामले की गहन जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर दिया है। समिति को एक माह के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को सौंपने का निर्देश भी दिया है। जिम्मेदार कंपनी (कोएम्प्ट एडुटेक) को ब्लैकलिस्ट और भारी जुर्माने की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन ये समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

वर्तमान हालात को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि देश में परीक्षा और परिणामों का मौसम अब छात्रों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रह गया है। हाल ही में सीबीएसई से 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (ओएसएम) प्रणाली को लागू करने के पीछे बोर्ड का उद्देश्य मूल्यांकन प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाना था। प्रणाली के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके ऑनलाइन अपलोड करने के बाद शिक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर उनका मूल्यांकन करते हैं, लेकिन इस बार परिणाम आते ही जो विसंगतियां सामने आईं, उसने पूरी मूल्यांकन प्रणाली और उसकी सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

परिणाम घोषित होने के बाद लगभग चार लाख छात्रों ने अपनी स्कैन कॉपी देखने के लिए आवेदन किया। यह आंकड़ा अपने आप में छात्रों के असंतोष और बोर्ड की कार्यप्रणाली के बीच की खाई को दर्शाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार छात्रों द्वारा दर्ज की गई शिकायतों में स्कैन कॉपियों का धुंधला होना, पेजों का क्रम बदलना और मूल्यांकन में स्टेप मार्किंग का नदारद होना शामिल है। कई छात्रों का आरोप है कि उनके प्राप्तांक उत्तर पुस्तिका में लिखे गए उत्तरों के अनुरूप नहीं हैं। कुछ छात्रों ने यह भी दावा किया कि जिस उत्तर पुस्तिका का मूल्यांकन दिखाया गया, वह उनकी उत्तर पुस्तिका ही नहीं थी। 

ऐसे में जब पूरी प्रक्रिया ही डिजिटल हो, तब इस तरह की 'मानवीय और तकनीकी' चूक सिस्टम की विश्वसनीयता को मिट्टी में मिला देती है। मीडिया रिपोर्ट्स और आंतरिक जांच से यह बात सामने आई है कि आनन-फानन लागू की गई इस प्रणाली से पहले व्यापक स्तर पर पायलट परीक्षण (ड्राई रन) नहीं किया गया था। टेंडर प्रक्रिया में भी नियमों में ढील दी गई, स्कैनिंग की गुणवत्ता से समझौता किया गया। ऐसे में जब मूल्यांकन की आधारशिला ही कमजोर होगी, तो परीक्षा परिणामों की सटीकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? शुरुआत में बोर्ड और सेवा प्रदाता कंपनी ने इन खामियों को छिटपुट बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन जब पुनर्मूल्यांकन का पोर्टल ही ठप हो गया और डेटा ब्रीच (सुरक्षा चूक) की बातें सामने आईं, तो यह साफ हो गया कि समस्या तकनीकी से ज्यादा प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर है। 

सरकार ने जब प्रभावित छात्रों को संसदीय समिति के सामने अपनी बात रखने का अवसर दिया, तो मंगलवार को संसदीय समिति के सामने 12वीं के छात्र सार्थक के सवाल और सात पन्नों के प्रजेंटेशन ने यह उजागर कर दिया कि डिजिटल परीक्षा सेवा प्रदाता कंपनी के चयन में नियमों की अनदेखी की गई। यहां तक कि निविदा शर्तों में बदलाव करके डेटा लीक करने वाली कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के प्रावधानों को भी कमजोर किया गया था। यदि किसी कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड पहले से ही खराब था, तो देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड ने लाखों छात्रों का भविष्य उसके भरोसे क्यों छोड़ दिया? 

इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि केंद्र सरकार को कड़ा कदम उठाना पड़ा। ओएसएम सेवाओं की खरीद और क्रियान्वयन प्रक्रिया की जांच के लिए विशेष समिति का गठन किया गया है, लेकिन क्या यह उन लाखों छात्रों के मानसिक तनाव की भरपाई कर सकता है, जो परीक्षा परिणाम के बाद से अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं? क्या केवल शीर्ष अधिकारियों को हटा देना और सेवा प्रदाता कंपनी पर जुर्माना लगाना इस समस्या का स्थाई समाधान है? नहीं, ऐसा नहीं है। अब सरकार और शिक्षा मंत्रालय की प्राथमिकता उन पीड़ित छात्रों को न्याय दिलाना होना चाहिए, जो तकनीकी खामियों के कारण पुनर्मूल्यांकन पोर्टल पर भटक रहे हैं। 

पूरे मामले में शामिल दोषियों की सख्त जांच होनी चाहिए, ताकि भविष्य में तकनीक सुधार का साधन बने, न कि छात्रों के लिए संकट का कारण। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने, परीक्षा परिणामों में आरोप आदि से शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई को इस संकट से सबक लेना होगा। तकनीक का इस्तेमाल शिक्षा को सुधारने और पारदर्शी बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे छात्रों के लिए एक जोखिम भरा खेल बनाने के लिए। सुधार के नाम पर बिना पूर्व तैयारी के राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी डिजिटल सिस्टम को थोपने से बचना चाहिए। ओएसएम में हुई यह गड़बड़ी केवल एक तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है कि आधुनिक शिक्षा सुधारों में जवाबदेही और सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।

संबंधित समाचार