संपादकीय : युद्धविराम का भ्रम

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Published By Pradeep Kumar
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पश्चिम एशिया एक बार फिर याद दिला रहा है कि यहां युद्ध और शांति के बीच की रेखा अक्सर धुंधली होती है। इजराइल-ईरान संघर्ष के बीच जब यह संकेत मिलने लगे थे कि अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहता है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार संभावित समझौते की बात कर रहे थे, तब ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई ने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अमेरिका का यह कहना कि उसने ‘आत्मरक्षा में आवश्यक कार्रवाई पूरी कर ली है’, दरअसल एक राजनीतिक और रणनीतिक संदेश है। इसका अर्थ यह नहीं कि संकट समाप्त हो गया है, बल्कि यह कि वाशिंगटन फिलहाल अपने सैन्य उद्देश्य पूरे मानकर आगे की प्रतिक्रिया का अधिकार सुरक्षित रखना चाहता है। यही कारण है कि ट्रंप के पूर्व बयानों और हालिया कार्रवाई के बीच विरोधाभास दिखाई देता है। उन्होंने नेतन्याहू को संयम बरतने की सलाह दी थी, लेकिन अमेरिका और इजराइल की रणनीतिक स्थितियां पूरी तरह समान नहीं हैं। स्पष्ट है कि वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच युद्ध की सीमा, समय और उद्देश्य को लेकर मतभेद मौजूद हैं। 

मित्र देशों के बीच मतभेद असामान्य नहीं होते, लेकिन वे रणनीतिक समन्वय को जटिल अवश्य बना देते हैं। आज स्थिति एक पूर्ण युद्ध और वास्तविक शांति के बीच अटकी हुई दिखाई देती है। इसे ‘नियंत्रित टकराव’ कहा जा सकता है, जहां सभी पक्ष संघर्ष को जारी भी रखते हैं और उसे व्यापक युद्ध में बदलने से बचाने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे सीमित संघर्ष कभी-कभी किसी गलत अनुमान, दुर्घटना या अत्यधिक प्रतिक्रिया के कारण अचानक बड़े युद्ध में बदल जाते हैं, इसलिए इस खतरे को कम करके नहीं आंका जा सकता। अमेरिका के भीतर भी लंबे विदेशी युद्धों के प्रति उत्साह सीमित है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभवों के बाद अमेरिकी जनता व्यापक सैन्य अभियानों के प्रति पहले जैसी उत्सुक नहीं दिखती। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी कार्रवाई को शक्ति प्रदर्शन और कूटनीति दोनों के रूप में प्रस्तुत करें। यही कारण है कि सैन्य कदमों के साथ बातचीत के दरवाजे भी पूरी तरह बंद नहीं किए जा रहे। 

भारत के लिए यह संकट विशेष चिंता का विषय है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक है। यहां अस्थिरता बढ़ने का सीधा असर तेल की कीमतों, समुद्री बीमा, मालभाड़े और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिकों और समुद्री कर्मियों की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी है। यही कारण है कि भारत ने सावधानीपूर्वक प्रतिक्रिया देते हुए तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है। वर्तमान घटनाक्रम का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि युद्धविराम अभी वास्तविक शांति नहीं है। यह एक ऐसा विराम है, जिसके भीतर संघर्ष की संभावनाएं जीवित हैं। 

यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते और संवाद को प्राथमिकता नहीं देते, तो सीमित संघर्ष किसी भी समय व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। पश्चिम एशिया को आज शक्ति प्रदर्शन से अधिक कूटनीति की आवश्यकता है, क्योंकि अगला विस्फोट केवल क्षेत्र को नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।