पीओके में पाक सेना की बर्बरता पर अंतर्राष्ट्रीय चुप्पी

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Published By Deepak Mishra
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बलूचिस्तान और पीओके में मानवाधिकारों के इस भयानक हनन पर चीन अमेरिका और पश्चिमी देश आंखें मुझे बैठे हैं। उन्हें चीन में उइगर मुसलमानों का उत्पीड़न भी नहीं दिखता जबकि भारत में किसी भी छिटपुट घटना पर ये देश आसमान सिर पर उठा लेते हैं।

Naveen Gupta
नवीन गुप्ता, बरेली

 

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में बुनियादी सुविधाओं और अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी निहत्थी जनता पर पाकिस्तानी सेना कहर ढा रही है। पिछले दो हफ्तों में 50 से अधिक नागरिक पाकिस्तानी सैनिकों की गोलियों के शिकार हो चुके हैं, लेकिन मानवाधिकारों के उल्लंघन पर भारत को ज्ञान देने वाला अमेरिका, यूरोपीय देश या इस्लामिक संगठन इस क्रूरता पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। न तो उन्हें पाकिस्तान द्वारा बहाए जा रहे बेगुनाहों के खून दिख रहे हैं और न ही वहां की महिलाओं और बेटियों की अस्मत पर आ रही आंच की कोई फिक्र है।

इसके विपरीत, भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में न सिर्फ औद्योगिक विकास को गति दी है, बल्कि मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की बड़े पैमाने पर स्थापना की है। सरकार वहां मूलभूत सुविधाओं के विकास पर पूरी ताकत से जुटी हुई है, जिसमें स्थानीय उमर अब्दुल्ला सरकार भी भरपूर सहयोग दे रही है। पानी, बिजली, सड़क, रेल नेटवर्क, दूरसंचार और रोजगार के बढ़ते साधनों ने यह साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का नारा जमीन पर फलीभूत हो रहा है। वहां की आवाम अब समझ चुकी है कि सरकार बिना मांगे, उन्हें हर जरूरी सुविधा दे रही है। यही वजह है कि अब वहां युवा न तो पत्थरबाजी करते दिखते हैं और न ही भारत विरोधी गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं। 

अब पाकिस्तान चाहकर भी जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को हवा नहीं दे पाता। अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध वह आज भी करता है, लेकिन तुर्किए और अजरबैजान जैसे कुछ चुनिंदा देशों को छोड़कर कोई उसका साथ नहीं देता, क्योंकि पूरी दुनिया जम्मू-कश्मीर की तरक्की और वहां कायम अमन को देख रही है। कुछ अमेरिकी और यूरोपीय देशों की संस्थाएं भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन का झूठा राग अलापती हैं, लेकिन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हो रहा वास्तविक दमन उन्हें दिखाई नहीं देता।

वहां ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ के बैनर तले बिजली कटौती, कमरतोड़ महंगाई और भारी-भरकम टैक्स के खिलाफ जब जनता सड़क पर उतरी, तो पाकिस्तानी सेना ने उसे बंदूक के दम पर कुचलना शुरू कर दिया। यह पहला मौका नहीं है, जब वहां सेना ऐसी बर्बरता कर रही है। इससे पहले भी हर शांतिपूर्ण आंदोलन को पुलिस और फौज की लाठियों व गोलियों से दबाया जाता रहा है। इसके बावजूद, पाकिस्तान से आजादी चाहने वाले वहां के नागरिक रावलकोट, मुजफ्फराबाद और कोटली जैसे शहरों में पूरी मजबूती से सेना के दमन के खिलाफ डटे हुए हैं।

भारत ने इस गंभीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) सहित वैश्विक मंचों पर भी उठाया है, लेकिन वीटो पावर वाले देशों की बात तो छोड़िए, खुद को मुस्लिमों का मसीहा बताने वाले देश भी इस पर खामोश हैं। तुर्किए से लेकर सऊदी अरब तक, किसी भी मुस्लिम देश ने पाकिस्तान की इस दमनकारी कार्रवाई की निंदा नहीं की है। इसी अंतर्राष्ट्रीय शह के कारण पाकिस्तानी सेना के हौसले बुलंद हैं और उसका आतंक लगातार बढ़ रहा है। अपनी इस बेलगाम सैन्य सनक में पाकिस्तान अब अफगानिस्तान सीमा पर भी हवाई हमले कर मासूम बच्चों समेत बेगुनाहों को मौत के घाट उतार रहा है, जिससे पूरा क्षेत्र अशांति की कगार पर पहुंच गया है, लेकिन इस पर भी वैश्विक महाशक्तियों का मौन समझ से परे है।

देखा जाए तो बेगुनाह नागरिकों को मौत के घाट उतारने का पाकिस्तानी सेना का इतिहास बहुत पुराना है। उसके सैनिकों की इसी बर्बरता से तंग आकर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने विद्रोह किया था, जिसके बाद भारतीय सेना के सहयोग से बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसी तरह, बंदूक के दम पर बलूचिस्तान को पाकिस्तान में मिलाया गया और आज भी वहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूटा जा रहा है। विरोध करने पर बलूच नागरिकों और युवाओं को जबरन गायब कर दिया जाता है या मार दिया जाता है। 

बलूचिस्तान और पीओके में मानवाधिकारों के इस भयानक हनन पर चीन, अमेरिका और पश्चिमी देश आंखें मूंदे बैठे हैं। उन्हें चीन में उइगर मुसलमानों का उत्पीड़न भी नहीं दिखता, जबकि भारत में किसी भी छिटपुट घटना पर ये देश आसमान सिर पर उठा लेते हैं। भले ही वे जानते हों कि भारत में जाति या धर्म के आधार पर राज्य द्वारा किसी का उत्पीड़न नहीं किया जाता।

इतिहास गवाह है कि संगीनों के दम पर आवाम की आवाज को ज्यादा दिनों तक दबाया नहीं जा सकता। पूर्वी पाकिस्तान का अलग होना और आज बलूचिस्तान से लेकर पीओके तक सुलगती आजादी की चिंगारी इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तानी हुक्मरान अपने ही अंत की पटकथा लिख रहे हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं, अमेरिका और मुस्लिम देशों को अपनी चश्मा-बदलू नीति छोड़नी होगी। भारत विरोधी प्रोपेगैंडा चलाने के बजाय यदि वैश्विक महाशक्तियों ने इस गंभीर मानवीय संकट पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, तो यह पूरे दक्षिण एशिया की शांति को निगल जाएगा। अब समय आ गया है कि दुनिया कश्मीर के इस हिस्से में हो रहे वास्तविक दमन को देखे, क्योंकि न्याय की गुहार लगाती पीओके की जनता की यह चीखें अब किसी भी वैश्विक पाखंड से दबने वाली नहीं हैं।

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