एडजस्टमेंट के दबाव में जिंदगी हारती बेटियां

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Published By Deepak Mishra
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डॉ. मोनिका शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

 

हाल ही में अलग-अलग राज्यों में हुई घटनाओं में विवाहिताओं की मौत के दिल दहलाने वाले मामले सामने आए हैं, जिन्होंने न सिर्फ इन राज्यों, बल्कि पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। नोएडा की दीपिका नागर, भोपाल की ट्विशा शर्मा और जयपुर की अनु मीणा के केस प्रताड़ना, उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं।

दीपिका और ट्विशा को लेकर आत्महत्या या हत्या की गुत्थी उलझी है और देश बेटियों को न्याय की मांग कर रहा है। पुलिस और कानून भी अपनी पेचीदगियों से मामलों के हर पक्ष की जांच में जुटे हैं। इसी बीच हाल ही में सुपीम कोर्ट में ट्विशा शर्मा संदिग्ध मानले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणी की है कि माता-पिता के लिए नैतिक रूप से यह बेहतर है कि “उनकी बेटी का तलाक हो जाए बजाय इसके कि उनकी बेटी की मृत्यु हो जाए”। 

संवेदनशील मुद्दे पर छिड़ी बहस के बीच यहां सवाल ये भी है कि शादी के इतने कम समय में मामलों में रिश्ते ही ये भयावह तस्वीर क्यों सामने आई? क्या इस रिश्ते के लिए कहे जाने वाले शब्द एडजस्टमेंट (समझौता) के दबाव में ये जिंदगियां हार गईं। अगर ऐसा है, तो एडजस्टमेंट के बोझ में शादी के बाद डोली से अर्थी में श्मशान तक का ये सफर आखिर कब तक और क्यों? आखिरकार ये पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत की तरह चला आ रहा एडजस्टमेंट शब्द इक्कीसवीं सदी में भी शादी जैसे बंधन पर भारी क्यों है?

असल में ट्विशा और दीपिका हमारे प्रबुद्ध समाज और उनमें पल रही करोड़ों बेटियों के वे चेहरे हैं, जो शादी के बाद खुशहाल जिंदगी के सपने संजोती हैं। दोनों ही पढ़ी-लिखी, समझदार और अपने पैरों पर खड़ी होने वाली होनहार लड़कियां थीं। इनमें दीपिका की शादी यूपी में ही धूमधाम से की गई थी, जबकि ट्विशा की शादी एक डेटिंग ऐप पर मुलाकात से हुई। दोनों के परिजनों ने मीडिया में दिए बयानों में कहा है कि शादी पूरे रीति-रिवाज और दान-दहेज देकर की गई थी। कुछ समय तो ठीक था, लेकिन बाद में उनकी बेटियों को परेशान और प्रताड़ित किया जाने लगा।

कई बार बेटियों ने अपनी परेशानी भी घरवालों से साझा की, लेकिन तब नई शादी और नए माहौल में एडजस्टमेंट करने की समझाइश की जाती रही। ससुराल पक्ष का भी यही कहना रहा कि उनकी बेटियों का रवैया और रहन-सहन अलग था, जिससे परिवार में झगड़े होने लगे थे। परिणामस्वरूप इस तालमेल और सामाजिक दबाव के डर में दोनों बेटियों की मौत हो गई।

वहीं जयपुर की अनु मीणा तो अपनी शादी के ग्यारह साल सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए झेलती रही। इस उम्मीद में कि शायद कभी सब ठीक होगा, लेकिन उसका सालों का समझौता भी आखिर में उसे मौत तक खींच ले गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल दहेज के कारण 6,000 से अधिक महिलाओं की मौत हो जाती है। मतलब हर 90 मिनट में एक महिला दहेज की बलि चढ़ जाती है।

वर्ष 2024 में दहेज हत्या के तहत 5,737 मामले दर्ज किए गए। दहेज हत्या के सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश (2,038), बिहार (1,078) और मध्य प्रदेश (450) से सामने आए हैं। वहीं पति और ससुराल वालों द्वारा क्रूरता के तहत सालाना 1 लाख 20 हजार से अधिक मामले दर्ज होते हैं। ये हालात तब हैं, जब ऐसे मामलों में दोषियों को कम से कम सात साल की सजा या आजीवन कारावास का भी प्रावधान है।

भारतीय समाज में शादी में एडजस्टमेंट के नाम पर बेटियों को गंभीर घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और दहेज उत्पीड़न सहने के लिए मजबूर करना एक ऐसी सामाजिक विफलता है, जो अक्सर बेटियों की असामयिक मौत या आत्महत्या का कारण बनती है। ट्विशा शर्मा और दीपिका जैसी कई शिक्षित बेटियों की दु:खद मौतों ने इस गंभीर मुद्दे पर देशव्यापी बहस छेड़ दी है। 

हालांकि वैवाहिक मामलों (दहेज उत्पीड़न व घरेलू हिंसा) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी को ससुराल में एडजस्ट (सामंजस्य बिठाने) करने की सलाह देना अपने आप में क्रूरता या उत्पीड़न नहीं माना जा सकता। कानूनी कार्रवाई के लिए उत्पीड़न के पुख्ता सबूत अनिवार्य हैं, लेकिन अदालत का संदेश यह भी है कि विवाह में आपसी सामंजस्य जरूरी है। एडजस्टमेंट की आड़ में महिलाओं के साथ होने वाली गंभीर शारीरिक या मानसिक क्रूरता को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

अंतहीन चर्चा में अब इस विषय पर गहराई से सोचने की जरूरत है। देश में उपज रहे इन मामलों से निपटने के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करने होंगे। समाज को अपनी सोच में बुनियादी बदलाव करने होंगे। वहीं माता-पिता को अपनी बेटियों को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनका जीवन किसी भी शादी या सामाजिक प्रतिष्ठा से कहीं अधिक कीमती है। सहिष्णुता की परिभाषा में प्रताड़ना और दुर्व्यवहार को सहना संस्कार नहीं, बल्कि अपराध को बढ़ावा देना है। कानूनी जागरूकता और कड़े कदम बढ़ाते हुए दहेज निषेध अधिनियम और घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों का सख्ती से पालन होना चाहिए। बेटियों को केवल शादी के लिए तैयार करने के बजाय, उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। (ये लेखिका के निजी विचार हैं)

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