सबसे शिक्षित पीढ़ी और मानसिक स्वास्थ्य की लड़ाई
शिक्षा संस्थानों ने सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL), साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड (PFA) और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने जैसे प्रयासों को प्रोत्साहित किया है।
भारत के स्कूलों से आज केवल अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी नहीं, बल्कि मानसिक रूप से मजबूत, आत्मविश्वासी और चुनौतियों का सामना करने वाले नागरिक तैयार करने की उम्मीद की जा रही है। समस्या यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था लंबे समय तक पहले लक्ष्य के लिए बनी रही, दूसरे के लिए नहीं। दशकों तक सफलता को अंकों, रैंक और परीक्षाओं के परिणामों से मापा गया, लेकिन 21वीं सदी की चुनौतियां केवल अकादमिक दक्षता से नहीं सुलझतीं। बदलती सामाजिक संरचनाएं, डिजिटल दुनिया का दबाव, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अनिश्चितताएं ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रही हैं, जिनमें भावनात्मक मजबूती और मानसिक संतुलन पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
यह बदलाव नीतियों, कक्षाओं और सार्वजनिक विमर्श में स्पष्ट दिखाई देता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 केवल अकादमिक उपलब्धियों पर नहीं, बल्कि समग्र विकास पर जोर देती है। शिक्षा संस्थानों ने सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL), साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड (PFA) और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने जैसे प्रयासों को प्रोत्साहित किया है। राष्ट्रीय स्कूल मानसिक स्वास्थ्य नीति पर चर्चा भी तेज हुई है। शिक्षा के दायरे से आगे बढ़कर मानसिक स्वास्थ्य अब सार्वजनिक नीति का अहम विषय बन चुका है। टेली-मानस जैसी पहलें इसका उदाहरण हैं। हाल के वर्षों में भारत ने ब्रिक्स सहयोग के मंच पर भी मानसिक स्वास्थ्य को अधिक प्राथमिकता देने की वकालत की है, लेकिन इन सकारात्मक पहलों के पीछे एक चिंताजनक सच्चाई भी मौजूद है।
आज के युवा भारतीय देश के इतिहास की सबसे अधिक शिक्षित पीढ़ियों में शामिल हैं। उनके पास जानकारी, तकनीक और अवसरों तक पहले से कहीं अधिक पहुंच है। इसके बावजूद शिक्षण समुदाय, माता-पिता, नियोक्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ तनाव, चिंता, अकेलेपन, बर्नआउट और भावनात्मक परेशानियों से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी की ओर लगातार ध्यान दिला रहे हैं। अब सवाल यह नहीं रह गया है कि मानसिक स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या हमारी संस्थाएं इस चुनौती का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं?
पिछले एक दशक में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सोच में बड़ा बदलाव आया है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 ने अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को मजबूती दी और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता दी। विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों ने सेवाओं का विस्तार किया, जबकि जागरूकता अभियानों ने मानसिक बीमारियों से जुड़े सामाजिक कलंक को कुछ हद तक कम करने में मदद की। ये बदलाव आवश्यक थे।
कार्यस्थलों का उदाहरण लें। हालिया रिपोर्टों के अनुसार भारत में बर्नआउट की समस्या दुनिया के कई देशों की तुलना में अधिक गंभीर दिखाई देती है। दूसरी ओर, अनेक संस्थान अब काउंसलिंग सेवाएं, कर्मचारी सहायता कार्यक्रम और वेलनेस पहल चला रहे हैं। इसके बावजूद इन सेवाओं का उपयोग अपेक्षा से कम होता है। कई कार्यरत पेशेवरों को यह चिंता रहती है कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता लेने पर सहकर्मी या प्रबंधन उन्हें किस नजर से देखेंगे। समस्या हमेशा सेवाओं की कमी नहीं होती। कई बार समस्या यह होती है कि लोगों को भरोसा नहीं होता कि सहायता लेने की कोई सामाजिक या पेशेवर कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी।
यही स्थिति युवाओं में भी दिखाई देती है। भारत में हर वर्ष 13 हजार से अधिक विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं। हर आंकड़े के पीछे एक अधूरी जिंदगी, एक बिखरता परिवार और एक अधूरा भविष्य छिपा होता है। परीक्षा का दबाव अक्सर इसकी प्रमुख वजह माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल परीक्षाओं को दोष देना समस्या को सीमित दृष्टि से देखना होगा, दरअसल यह केवल शिक्षा व्यवस्था का संकट नहीं है। यह उस सामाजिक माहौल पर भी गंभीर सवाल है, जिसमें हजारों युवा मदद मांगने से पहले हार मान लेते हैं।
किशोरों और युवाओं की भावनात्मक परेशानियां सामाजिक तुलना, पारिवारिक अपेक्षाओं, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलेपन, डिजिटल दबाव और सहायता लेने में झिझक जैसी अनेक वजहों से प्रभावित होती हैं। शिक्षक-शिक्षिकाओं और शिक्षा विशेषज्ञों की एक बड़ी चिंता यह है कि हमारे विद्यार्थी परीक्षाओं के लिए तो तैयार होते हैं, लेकिन असफलताओं का सामना करने के लिए नहीं।
सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL) को दुनिया भर में तेजी से महत्व मिल रहा है। SEL भावनाओं को समझने और नियंत्रित करने, सहानुभूति विकसित करने, संवाद कौशल को मजबूत बनाने, स्वस्थ संबंध स्थापित करने, जिम्मेदार निर्णय लेने और चुनौतियों से उबरने जैसी क्षमताओं पर जोर देता है। इन्हें अक्सर ‘सॉफ्ट स्किल्स’ कहा जाता है, लेकिन शोध बताते हैं कि इनका प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता, कक्षा में सहभागिता और दीर्घकालिक विकास पर भी पड़ता है। SEL में बढ़ती रुचि शिक्षा को लेकर बदलती सोच का संकेत है। नीति-निर्माता अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि स्कूल केवल ज्ञान देने वाली संस्थाएं नहीं हैं। वे ऐसे वातावरण भी हैं जहां युवा स्वयं को समझना, दूसरों से जुड़ना और जीवन की चुनौतियों का सामना करना सीखते हैं।
