संपादकीय : हादसा और सबक

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Published By Deepak Mishra
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असम के जोरहाट एयरबेस पर भारतीय वायुसेना के एएन-32 परिवहन विमान की दुर्घटना देश की सामरिक परिवहन क्षमता, सैन्य आधुनिकीकरण और रक्षा तैयारियों से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। इस दुर्घटना में पांच वायुयोद्धाओं का बलिदान हुआ, राष्ट्र उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता है, किंतु शोक के साथ-साथ आत्ममंथन भी आवश्यक है। 1980 के दशक में वायु सेना के बेड़े में शामिल सोवियत मूल का एएन-32 वायुसेना का “वर्कहॉर्स” कहाता है। यह हिमालयी क्षेत्रों, ऊंचे हवाई अड्डों और दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में रसद पहुंचाने की अपनी क्षमता के कारण भारतीय सैन्य व्यवस्था की रीढ़ रहा है।

करगिल युद्ध से लेकर पूर्वोत्तर और लद्दाख तक, इसकी भूमिका निर्विवाद रही है। किंतु अब यह चिंता का विषय है कि जिस विमान पर चार दशक से अधिक समय से अत्यधिक निर्भरता रही है, वह आज अपनी आयु सीमा और तकनीकी चुनौतियों से जूझ रहा है। जोरहाट दुर्घटना को व्यापक संदर्भ में देखें, तो एक चिंताजनक पैटर्न सामने आता है। 2009 में अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम सियांग में एएन-32 दुर्घटना, 2016 में बंगाल की खाड़ी के ऊपर विमान का लापता होना, 2019 में जोरहाट से मेचुका जाते समय हुए हादसे के अलावा कुछ दूसरी बड़ी दुर्घटनाओं के बाद अब 2026 की यह त्रासदी- ये घटनाएं बताती हैं कि परिवहन बेड़े की सुरक्षा और आधुनिकीकरण का प्रश्न आज तक हल नहीं हो सके हैं।

विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि 2009, 2019 और 2026 की दुर्घटनाओं का संबंध सीधे जोरहाट एयरबेस से जुड़ा रहा है, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र में वायुसेना के लिए एक महत्वपूर्ण परिचालन केंद्र है। दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की रिपोर्ट के बाद ही चलेगा, लेकिन जांच में तकनीकी खराबी, संरचनात्मक कमजोरी या रखरखाव संबंधी समस्या सामने आती है, तो यह रक्षा प्रतिष्ठान के लिए गंभीर चेतावनी होगी। यदि कारण मानवीय त्रुटि या प्रतिकूल परिस्थितियां निकलती हैं, तब भी प्रशिक्षण, प्रक्रियाओं और सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा आवश्यक होगी।

सच है कि वायुसेना पिछले कुछ वर्षों से परिवहन बेड़े के आधुनिकीकरण पर काम कर रही है, लेकिन भारत जैसे विशाल और भौगोलिक दृष्टि से जटिल देश में पुराने प्लेटफॉर्म को नए विमानों से बदलने की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाई है। इसीलिए एएन-32 का बड़ा बेड़ा अभी भी सेवा में है और आने वाले वर्षों में भी उसकी आवश्यकता बनी रहेगी। असल में नए विमान खरीदने से ज्यादा जरूरत एक समग्र नीति की है। इसमें समयबद्ध प्रतिस्थापन, स्पेयर पार्ट्स की सुनिश्चित उपलब्धता, स्वदेशी रखरखाव क्षमता, उन्नत सुरक्षा ऑडिट और दुर्घटना जांच रिपोर्टों के निष्कर्षों का कठोर अनुपालन शामिल होना चाहिए।

रक्षा क्षेत्र में उपकरणों की विश्वसनीयता केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि सैनिकों के जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। जोरहाट की यह दुर्घटना हमें याद दिलाती है कि सैन्य शक्ति केवल नए हथियारों से नहीं बनती, बल्कि उन प्रणालियों की सुरक्षा और विश्वसनीयता से भी बनती है जिन पर हमारे सैनिक प्रतिदिन भरोसा करते हैं। शहीद वायुयोद्धाओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस हादसे से सबक लेकर भारत अपने सैन्य परिवहन तंत्र को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाए।