सांस्कृतिक विरासत के सहचर हैं तालाब

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Published By Anjali Singh
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विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल का समुचित सदुपयोग ही जल संरक्षण है। पृथ्वी पर नदियों, तालाबों, झीलों के रुप में उपलब्ध जल का प्रबंधन एवं उपयोग सुनिश्चित करके इसे अक्षय रखा जा सकता है। भारत की अधिसंख्य जनसंख्या ग्रामवासिनी है। कभी पोखर और तालाब गांवों की साझी विरासत होने के साथ-साथ सुख-
दुख के भागीदार भी थे। विकास की चाह में भागते मनुष्य ने इन्हें कब उपेक्षित पंक्ति में ला खड़ा किया और स्वयं अपने लिए आपदाओं को रास्ता दे दिया। संभवतः वो स्वयं समझ न पाया। जन्म, विवाह का उत्सव हो या मृत्यु के कर्मकांड तालाब अपने जल की शीतलता से सबको सरस, सहज करते रहे। इन्हीं तालाबों के किनारों पर हरी घास चरते गोवंश और उन्हें चराने वालों की बतकही और तनाव, सुख-दुख साझा करना अब दुर्लभ है।

मंगल कार्यों के साक्षी तालाब

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जल से परिपूर्ण तालाब अव स्मृतियों में ही शेष हैं। प्रत्येक गांव की अपनी संस्कृति, अपने उत्सव अपने तालाब होते हैं। ऐसे ही नहीं अपने नाम से जाने जाते यह तालाब पुरखों सा मान सम्मान और देखभाल पाते थे। यही तालाब कभी बड़े-बुजुर्गों के भ्रमण स्थल, कभी बच्चों के मनोरंजन का स्थान और गांव भर के पशुओं की प्यास बुझाने का साधन होते थे। उत्सवों का पूर्ण आनंद इन तालाबों के किनारों पर आता था, जब अस्ताचलगामी भुवन भास्कर धूमिल स्वर्णमयी आभा में ग्रामीण कुल-वधुओं, बेटियों की मधुर स्वर लहरियों में तीज और कजरी से लोकगीतों के साथ घर-परिवार के मंगल हेतु दीपकों की प्रकंपित लौ के साक्षी भी यह तालाब ही रहे।

लोकमान्यताओं से जुड़े गांवों के यह स्थलीय देव अपने स्नाथानीय नामों से सुविख्यात रहे। भूमि के अतिक्रमण, कटते वृक्षों, भौतिकतावादी विचारधारा ने तालाबों और स्वयं के जीवन को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है। अभी भी समय है यदि अब भी जल संचयन और संरक्षण पर गंभाीरता से विचार न किया गया, तो वह दिवस सन्निकट है, जब दो बूंद जल के लिए हम व्याकुल होंगे।

जरूरी है तालाबों को बचाना

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गावों की अस्मिता और जल संपदा के भंडार तालाबों को न केवल पुनर्जीवित करने की महती आवश्यकता है वरन जनमानस को पुनः तालाबों से जोड़ने को प्रेरित करना होगा। तालाबों के सौंदर्यीकरण के साथ-साथ इनके किनारों पर पौधारोपण करके पर्यावरण संरक्षण की ओर एक कदम बढ़ाना होगा। अधिक संख्या में तालाबों के किनारों पर लगे वृक्ष ग्रामवासियों के साथ ही पशु-पक्षियों का आश्रय स्थल भी बनेंगे। घने वृक्षों के कारण तालाबों का अतिक्रमण भी रुकेगा वर्षा के जल से भरे-पूरे तालाब वसुंधरा को पयोधरा भी बना देंगे। जल संकट की आती आहट से गांवों के यह साझीदार ही बचा सकते हैं। विचारणीय है कि जल संपदा का अक्षय भंडार न केवल संरक्षित करें वरन उसे और समृद्ध करने का निरंतर प्रयत्न करें जीवन तभी संभव है। योजनाओं से पल्लवित अमृत सरोवर केवल बनवा देने से अपना हेतु सिद्ध नहीं कर पाएंगे। इसके लिए निरंतर देखभाल तालाबों से जुड़ाव और ग्रामवासियों का लगाव अहम भूमिका निभाएगा। इन तालाबों का संरक्षण और पोषण ऐसे हो कि संपूर्ण गांव के वर्षा जल की पहुंच इन तालाबों तक बनानी होगी। भरपूर जल संचय से ये जल संपदा के अक्षय भंडार बनकर न सिर्फ गांववासियों, बल्कि पृथ्वी की भी प्यास बुझाकर अपनी संस्कृति, संस्कार और सामाजिक समरसता के वाहक बनेंगे।


अमिता शुक्ला पुवायां