टूटे घट का रहस्य
बहुत समय पहले की बात है, एक गुरुकुल में आचार्य चाणक्य के शिष्य देवव्रत शिक्षा पा रहे थे। देवव्रत स्वभाव से बहुत सीधे और सरल थे, लेकिन उनकी एक समस्या थी, उन्हें चीजें बहुत जल्दी भूल जाती थीं। गुरुजी जो भी श्लोक या पाठ पढ़ाते, वह उनके दिमाग से रेत की तरह फिसल जाता। देवव्रत इस बात से हमेशा उदास रहते थे। एक दिन, आचार्य ने देवव्रत को अपने पास बुलाया और मिट्टी के दो घड़े दिए।
पहला घड़ा बिल्कुल नया, सुंदर और मजबूत था। दूसरा घड़ा पुराना था और उसमें नीचे एक छोटा सा छेद (दरार) था। आचार्य ने कहा, “देवव्रत, आज से तुम्हारा काम केवल इतना है कि तुम रोज सुबह नदी से इन दोनों घड़ों में पानी भरकर आश्रम के रसोईघर तक लाओगे।”
देवव्रत ने आज्ञा का पालन किया। वह रोज सुबह नदी पर जाते, दोनों घड़ों को पानी से भरते और कंधे पर लादकर आश्रम लौटते, लेकिन हर बार एक ही बात होती। मजबूत घड़ा पूरा पानी बचाकर आश्रम पहुंचता। टूटा हुआ घड़ा अपने छेद के कारण रास्ते में आधा पानी गिरा देता और आश्रम पहुंचते-पहुंचते खाली हो जाता। ऐसा चलते हुए कई महीने बीत गए। देवव्रत को लगने लगा कि वह अपनी कमजोरी (भूलने की बीमारी) की तरह ही इस टूटे घड़े के साथ भी व्यर्थ का श्रम कर रहे हैं। आखिरकार, एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने आचार्य के सामने सिर झुकाकर कहा- “गुरुदेव, मैं स्वयं को अपराधी मानता हूं। मेरी बुद्धि भी इस टूटे घड़े की तरह है, जिसमें कोई ज्ञान नहीं टिकता। इस घड़े के कारण आपकी आधी मेहनत और पानी भी रोज बर्बाद हो जाता है। मुझे इस व्यर्थ के काम से मुक्त कर दीजिए।”
आचार्य मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “देवव्रत, तुम जिसे बर्बादी समझ रहे हो, जरा उस रास्ते को ध्यान से देखो, जिससे तुम रोज पानी लेकर आते हो। कल सुबह आते समय रास्ते के दोनों किनारों को देखना।”
अगले दिन सुबह, जब देवव्रत नदी से पानी भरकर लौट रहे थे, तो उन्होंने रास्ते पर ध्यान दिया। वह यह देखकर हैरान रह गए कि जिस तरफ वह मजबूत घड़ा लेकर चलते थे, उस तरफ की जमीन सूखी और बंजर थी, लेकिन जिस तरफ वह टूटा हुआ घड़ा लेकर चलते थे, उस तरफ रंग-बिरंगे, सुंदर फूलों के पौधे लहलहा रहे थे और पूरा रास्ता सुगंध से महक रहा था।
आचार्य ने उन्हें समझाते हुए कहा- “देवव्रत, मैं जानता था कि इस घड़े में दरार है। इसलिए मैंने उस तरफ के रास्ते पर फूलों के बीज बो दिए थे। तुम रोज अनजाने में ही सही, अपनी कमजोरी (टूटे घड़े) से उन बीजों को सींचते रहे। आज तुम्हारी इसी ‘कमजोरी’ के कारण आश्रम का रास्ता इतना सुंदर और जीवंत बन सका है।”
कहानी की सीख- हम सब के अंदर कोई न कोई कमी या कमजोरी होती है। कोई पढ़ने में धीमा होता है, तो कोई किसी काम में निपुण नहीं होता, लेकिन इस कहानी से हमें दो बातें सीखने को मिलती हैं। यदि हम सही दिशा में प्रयास करते रहें, तो हमारी कमियां भी किसी न किसी रूप में संसार को सुंदर बनाने के काम आ सकती हैं। देवव्रत की भूलने की आदत ने उन्हें लगातार अभ्यास करना सिखाया और उनकी उसी निरंतरता ने रास्ते को फूलों से भर दिया। स्वयं को कभी भी ‘टूटा हुआ घड़ा’ समझकर कमतर न आंकें।
