अब नेपाल से सुलझ जाएगा सीमा विवाद

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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हमारे पड़ोसी देश नेपाल के साथ हमारे संबंध विश्वास और स्थिरता के रहे हैं। भारत-नेपाल के बीच 1950 में हुई सुलह, शांति और दोस्ती की संधि के रूप में आज भी कायम है।

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प्रमोद भार्गव,
वरिष्ठ पत्रकार

 

जब से नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार अस्तित्व में आई है, तब से इस शांतिप्रिय देश की राजनीति दबावमुक्त अनुभव होने लगी है। चीन के हस्तक्षेप के चलते भारत से नेपाल की जो दूरियां बढ़ती चली जा रहीं थीं, वे अब कम हो रही हैं। इसी का परिणाम है कि नेपाल के भारत आए विदेश मंत्री शिशिर खनल ने नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए साफ कर दिया कि काठमांडू भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद को तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के बिना मौजूदा द्विपक्षीय वार्ता के जरिए सुलझाने का इच्छुक है। उनका कहना है कि जब दोनों पक्ष खुले दिल, तर्कसंगत सोच और आपसी सम्मान के साथ बैठते हैं, तो कोई समस्या जटिल नहीं रह जाती। नेपाल नई दिल्ली को 21वीं सदी की भू-राजनीति के अति संवेदनशील चश्मे से नहीं देखना चाहता है। दोनों देश एक पारदर्शी अजेंडे पर आगे बढ़ेंगे। इस कड़ी में भारत नेपाल को पुराने बोझ का बंधक बनाए रखना नहीं चाहती है।

खनल की भारत यात्रा ऐसे समय में हुई, जब बालेंद्र शाह ने सीमा विवाद को लेकर चीन और ब्रिटेन का जिक्र किया था, जिसे भारत ने पूरी तरह नकार दिया था। इस पर सफाई देते हुए खनल ने साफ कर दिया कि ब्रिटेन से संबंधित टिप्पणी केवल ऐतिहासिक दस्तावेज और ब्रिटिश लाइब्रेरी म्यूजियम से जानकारी हासिल करने तक सीमित थी, न कि मध्यस्थता की मांग थी। दरअसल सीमा विवाद की शुरुआत नेपाल की कैबिनेट ने 18 मई 2020 को एक नए राजनीतिक मानचित्र को मंजूरी देकर भारत से विवाद गहरा देने का नया रास्ता खोल दिया था, लेकिन नेपाल की तत्कालीन केपी शर्मा ओली सरकार इन मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के बहाने सर्वदलीय बैठक बुलाने की बात कहकर पीछे हट गई थी। 

नेपाल के सभी दलों के नेताओं ने भारत के साथ बातचीत कर इस मुद्दे को सुलझाने का सुझाव दिया था। तब इस पहल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक व कूटनीतिक सफलता और चीन की कूटनीतिक पराजय माना गया था, दरअसल इस विवाद को लेकर भारत की शंका चीन पर थी। इस सीमा विवाद में लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा क्षेत्र शामिल थे। इन विवादित स्थलों की सीमा भारत और नेपाल के साथ चीन से भी जुड़ती है। मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाने के लिए उत्तराखंड के पिथैरागढ़ जिले में भारत सरकार ने लिपुलेख मार्ग खोल दिया था। 

इसी का जवाब देने के लिए नेपाल ने अपने नए मानचित्र में कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र को अपने देश के नए मानचित्र में दिखा दिया था। इस सिलसिले में भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना था कि इस मार्ग को खोलने से पहले तक नेपाल के मानचित्र में यह स्थिति नहीं थी। विवादित मानचित्र जारी करते हुए नेपाल ने दावा किया था कि 1816 में नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई सुगौली संधि के अनुसार काला पानी क्षेत्र उसका है। 1860 में इस क्षेत्र की भूमि का पहली बार सर्वे किया गया था। इसके बाद 1929 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही काला पानी को भारत का हिस्सा घोषित किया था, नेपाल ने भी इसकी पुष्टि कर दी थी। भारत की आजादी के बाद भी यही स्थिति बनी रही, किंतु नेपाल में चीन द्वारा किए जा रहे बड़े पूंजी निवेश के चलते नेपाल को यह हरकत करनी पड़ गई थी।  

हमारे पड़ोसी देशों में नेपाल और भूटान ऐसे देश हैं, जिनके साथ हमारे संबंध विश्वास और स्थिरता के रहे हैं। यही वजह है कि भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुई सुलह, शांति और दोस्ती की संधि आज भी कायम है। नेपाल और भूटान से जुड़ी 1850 किमी लंबी सीमा रेखा बिना किसी पुख्ता पहरेदारी के खुली है। बावजूद चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह कोई विवाद नहीं है। बिना पारपत्र के आवाजाही निरंतर है। करीब 60 लाख नेपाली भारत में काम करके रोजी-रोटी कमा रहे हैं। 3000 नेपाली छात्रों को भारत हर साल छात्रवृत्ति देता है। नेपाल के विदेशी निवेश में भी अब तक का सबसे बड़ा 47 प्रतिशत हिस्सा भारत का है। बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेपाल का झुकाव चीन की ओर बढ़ रहा है, हालांकि नरेंद्र मोदी ने अगस्त-2014 में नेपाल की यात्रा करके बिगड़ते संबंधों को आत्मीय बनाने की सार्थक पहल की थी, किंतु भारतीय मूल के मधेषियों के आंदोलन ने इस पर पानी फेर दिया था।

नेपाल की पिछली सरकारों द्वारा चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को जो नए आयाम दिए हैं, उनके तहत ऐतिहासिक पारगमन व्यापार समझौते समेत 10 समझौतों की शुरुआत करके नेपाल ने चीन से रिश्ते मजबूत कर लिए हैं। इस समझौते में सबसे खास बात है कि नेपाल अब भारत के कोलकाता स्थित हल्दिया बंदरगाह के बजाय 3000 किमी दूर स्थित चीनी तियानजिन बंदरगाह से अपने जरूरी सामानों की आपूर्ति करने लगा है, जबकि भारत का बंदरगाह नेपाल की सीमा से करीब 1000 किमी की दूरी पर है। विडंबना है कि नेपाल चीन के इस बंदरगाह का तुरंत इस्तेमाल नहीं कर सकता है, क्योंकि चीनी बंदरगाह ऊंचाई पर है और नेपाल में आधारभूत ढांचा उन्नत नहीं है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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