पुरखों की तकनीकी दक्षता के प्रमाण हैं हमारे मंदिर-शिल्प
भारतीय मूर्तिकला में ग्रेनाइट, बेसाल्ट, डोलराइट और क्वार्ट्जाइट जैसे कठोर पत्थरों पर की गई महीन नक्काशी सदियों से शोध और कौतूहल का विषय रही है। हाल के वर्षों में कुछ ऐसे दावे भी सामने आए हैं कि प्राचीन भारतीय शिल्पी किसी विशेष रासायनिक प्रक्रिया द्वारा पत्थरों को मुलायम बना लेते थे, जिससे उन पर उत्कीर्णन सरल हो जाता था। इन दावों के समर्थन में प्रायः नागार्जुन के नाम से संबद्ध ग्रंथ रस रत्नाकर का उल्लेख किया जाता है।
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रसशास्त्रीय ग्रंथ
वास्तव में रस रत्नाकर मुख्यतः रसशास्त्र, धातुविज्ञान और खनिज-प्रसंस्करण का ग्रंथ है। इसमें धातुओं, खनिजों और रत्नों के शोधन तथा विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है। कुछ स्थानों पर ऐसे लेपों, क्षारों और वनस्पति-आधारित मिश्रणों का उल्लेख अवश्य है, जो पत्थर की सतह पर प्रभाव डाल सकते हैं, किंतु उपलब्ध वैज्ञानिक और पुरातात्विक प्रमाण यह स्वीकार नहीं करते कि उनसे ग्रेनाइट या बेसाल्ट जैसे कठोर पत्थरों को इतना मुलायम बनाया जा सकता था कि उन पर लकड़ी या मिट्टी की तरह आसानी से नक्काशी की जा सके। आधुनिक पदार्थ-विज्ञान की दृष्टि से भी यह संभावना अत्यंत सीमित प्रतीत होती है। यदि ऐसा संभव होता, तो प्राचीन और आधुनिक शिल्प परंपराओं में छेनी, हथौड़ी, ड्रिल और घर्षण तकनीकों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। संभवतः प्राचीन ग्रंथों में “पत्थर को मुलायम करने” का आशय उसकी सतह को कुछ हद तक क्षरित करने या उत्कीर्णन को अपेक्षाकृत सरल बनाने से रहा होगा। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रसशास्त्रीय ग्रंथों में कई प्रक्रियाएं सांकेतिक अथवा अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में वर्णित हैं।
पीढ़ियों से अर्जित कौशल
भारतीय शिल्प परंपरा का वास्तविक आधार अत्यंत विकसित औजार, घर्षण तकनीकें और पीढ़ियों से अर्जित कौशल था। इस संदर्भ में समरांगण सूत्रधार, मानसार, मयमतम्, अपराजितपृच्छा, शिल्परत्न, काश्यप शिल्पशास्त्र तथा विभिन्न आगम ग्रंथों का विशेष महत्व है। ये ग्रंथ शिला-चयन, मूर्तिनिर्माण, अनुपात, आयाम और स्थापत्य सिद्धांतों की विस्तृत जानकारी देते हैं। हालांकि इनमें तकनीकी प्रक्रियाओं का विवरण अपेक्षाकृत कम है, क्योंकि अधिकांश व्यावहारिक ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से मौखिक रूप से हस्तांतरित होता था। पत्थर तराशने की प्रक्रिया चरणबद्ध होती थी। प्रारंभ में बड़े हथौड़ों और छेनी की सहायता से पत्थर का मोटा आकार निकाला जाता था। इसके बाद नुकीली और सपाट छेनियों द्वारा सूक्ष्म विवरण उकेरे जाते थे। अंतिम चरण में अत्यंत महीन औजारों तथा घर्षण पदार्थों की सहायता से सतह को परिष्कृत किया जाता था।
तकनीकी दक्षता और गणितीय सटीकता
भारत में प्राचीन काल से उच्च गुणवत्ता वाले लोहे और इस्पात के निर्माण की परंपरा रही है। इन्हीं से निर्मित छेनी, ड्रिल और हथौड़ियां कठोर पत्थरों पर कार्य करने में प्रयुक्त होती थी। साथ ही रेत, क्वार्ट्ज चूर्ण, कोरंडम तथा एमरी जैसे घर्षक पदार्थों का उपयोग सतह को चिकना और चमकदार बनाने के लिए किया जाता था। सूक्ष्म छिद्रों और जालीदार संरचनाओं के निर्माण में धनुष-ड्रिल जैसी तकनीकें भी प्रयुक्त होती थीं। इन उपकरणों से भी अधिक महत्वपूर्ण थी शिल्पियों की पत्थर के स्वभाव संबंधी गहरी समझ। वे शिला की प्राकृतिक दरारों, दानेदार संरचना और मजबूती को पहचानकर उसी के अनुरूप कार्य करते थे। मूर्ति अथवा स्थापत्य का प्रारूप पहले माप-प्रणालियों और रेखांकन के आधार पर तैयार किया जाता था। यही कारण है कि भारतीय शिल्पकला में तकनीकी दक्षता और गणितीय सटीकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
सबसे बड़ी विरासत
भारतीय मंदिर स्थापत्य इसके उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। एलोरा का कैलासनाथ मंदिर एक ही विशाल चट्टान को काटकर निर्मित किया गया है। होयसलेश्वर मंदिर में सोप स्टोन पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी देखने को मिलती है। दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर की अद्भुत बारीक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है, जबकि तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर कठोर ग्रेनाइट पर उत्कृष्ट शिल्पकौशल का अनुपम उदाहरण है। स्पष्ट है कि भारतीय मूर्तिकला की महान उपलब्धियां किसी रहस्यमयी रासायनिक विधि का परिणाम नहीं थीं। वे धातुविज्ञान, घर्षण तकनीकों, गणितीय माप-प्रणालियों, पत्थरों की गहन समझ और पीढ़ियों से संचित शिल्प-कौशल के संयुक्त प्रतिफल थीं। एलोरा, खजुराहो, कोणार्क और होयसला मंदिरों की नक्काशी आज भी हमें यह बताती है कि हमारे पूर्वजों की तकनीकी दक्षता, श्रम और कलात्मक दृष्टि कितनी विलक्षण थी। यही हमारे मंदिर-शिल्प की सबसे बड़ी विरासत है।
सुमन कुमार सिंह
