जेठ की दोपहरी और बाग की मस्ती 

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Published By Anjali Singh
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जेठ की दोपहरी का नाम सुनते ही आज भी शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती है और आंखें उस तपती हुई रेत जैसे आंगन में पहुंच जाती हैं, जहां बचपन बीता था। जून के महीने में सूरज आसमान के ठीक बीचों-बीच आकर जैसे आग बरसाने लगता था। हवा के नाम पर सिर्फ ‘लू’ के थपेड़े चलते थे, जो चेहरे पर लगते ही झुलसा देते थे। गांव के उस पुराने घर में जेठ की दोपहरी एक अलग ही सन्नाटा लेकर आती थी। 
 
दोपहर के बारह बजते ही सड़कों पर इंसानों की आवाजाही पूरी तरह थम जाती थी। पशु-पक्षी भी किसी घने पेड़ की छांव या कोनों में दुबककर हांफने लगते थे। घर की बुजुर्ग महिलाएं मिट्टी के घड़े के ठंडे पानी में खस डालकर कमरों को ठंडा रखने का प्रयास करती थीं। हम बच्चों के लिए यह समय किसी परीक्षा से कम नहीं था। मां की सख्त हिदायत होती थी- “इस धूप में बाहर कदम मत रखना, लू लग जाएगी।” 
 
लेकिन बचपन का उत्साह इस तपिश पर भारी पड़ता था। जैसे ही घर के बड़े-बूढ़े दोपहर की नींद की आगोश में समाते, हमारी टोली दबे पांव बाहर निकल आती थी। हम सीधे बाग की तरफ भागते थे, जहां आम के पेड़ों की घनी छांव में थोड़ी राहत मिलती थी। उस तपती दोपहरी में कच्ची अमिया तोड़ना, उन पर नमक-मिर्च लगाकर खाना और फिर कुएं के ठंडे पानी से हाथ-मुंह धोना जीवन का सबसे बड़ा सुख था। 
 
कभी-कभी दूर से आती कुल्फी वाले की घंटी की आवाज सन्नाटे को चीरती थी। उस समय पचास पैसे की वह बर्फ की कुल्फी जेठ की सारी तपिश को पलभर में गायब कर देती थी। आज शहरों के वातानुकूलित (एसी) कमरों में बैठकर वह जेठ की दोपहरी तो नहीं खलती, लेकिन वह सादगी, अपनों का साथ और प्रकृति से जुड़ाव कहीं खो गया है। वह तपती दोपहरी आज भी यादों के झरोखे से जीवन को शीतलता प्रदान कर जाती है।
 
-माशा

 

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