धर्म ही जीवन का सच्चा आश्रय और शाश्वत सहारा

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Edited By Anjali Singh
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मनुष्य का जीवन दो संसारों के बीच निरंतर चलता है। एक वह संसार है, जो हमारी आंखों से दिखाई देता है और दूसरा वह जो अदृश्य होते हुए भी हमारे अस्तित्व का वास्तविक आधार है। दृश्य संसार में शरीर, परिवार, धन, पद, प्रतिष्ठा और संबंध आते हैं, जबकि अदृश्य संसार में आत्मा, उसका धर्म और उसका शाश्वत स्वरूप विद्यमान है। सामान्यतः मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय दृश्य संसार को ही सत्य मानकर बिताता है। वह शरीर को ही अपना वास्तविक अस्तित्व समझ लेता है और इसी कारण ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ के मोह में उलझ जाता है। यही मोह संसार के समस्त बंधनों का मूल कारण बनता है।

‘मैं’का भाव वास्तव में शरीर से जुड़ी हुई उपाधियों का भाव है। मनुष्य कहता है कि मैं अमुक जाति का हूं, मैं स्त्री हूं या पुरुष हूं, मैं विद्वान हूं, व्यापारी हूं, अधिकारी हूं या विद्यार्थी हूं। ये सभी पहचानें शरीर से संबंधित हैं, आत्मा से नहीं। आत्मा न किसी जाति की है, न किसी पद की और न ही किसी बाहरी पहचान की। उसी प्रकार ‘मेरा’ का विस्तार परिवार, धन, संपत्ति, मित्र और समाज तक फैल जाता है। मनुष्य कहता है कि यह मेरा घर है, मेरा परिवार है, मेरी प्रतिष्ठा है और मेरी उपलब्धियां हैं। इसी ‘मैं’ और ‘मेरा’ के विस्तार को संसार कहा गया है। आत्मा इन सबसे परे है। वह न किसी की मालिक है और न किसी की संपत्ति।

मनुष्य के भीतर मस्तिष्क, हृदय और कर्म- ये तीनों प्रमुख शक्तियां कार्य करती हैं। मस्तिष्क में आश्रय का विचार रहता है, हृदय में अपनत्व का भाव और हाथों से कर्म संपन्न होते हैं। जब मनुष्य किसी व्यक्ति या वस्तु को अपना सहारा मान लेता है, तब उसका हृदय उसी के प्रति आसक्त हो जाता है और उसके सारे कर्म उसी आसक्ति के अनुसार चलने लगते हैं। जबकि धर्म का संदेश यह है कि कर्तव्य का पालन अवश्य करो, माता-पिता की सेवा करो, परिवार का पालन करो, समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाओ, किंतु उन्हें अपना अंतिम आश्रय मत मानो। क्योंकि संसार का प्रत्येक संबंध समय के साथ छूट जाने वाला है। 

जीवन अत्यंत मूल्यवान है। इसका बड़ा भाग अज्ञान, मोह और निद्रा में व्यतीत हो जाता है। जो समय जागृत अवस्था में मिला है, उसे भी यदि केवल ‘मैं’ और ‘मेरा’ के मोह में गंवा दिया जाए, तो मनुष्य अपने वास्तविक उद्देश्य से वंचित रह जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि हम संसार में रहें, अपने सभी कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें, किंतु अपने मन का आश्रय केवल धर्म और आत्मा में रखें। यही जीवन की सच्ची साधना है, यही स्थायी शांति का मार्ग है और यही वह सत्य है, जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधनों से ऊपर उठाकर आत्मबोध की ओर ले जाता है।

कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार

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