त्रिभाषा के सूत्र में त्रिशंकु बनी भाषा शिक्षा
भारत में भाषाई विविधता जितनी समृद्ध है, उतनी ही जटिल भी। इसी जटिलता को सुलझाने और राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोने के लिए 'त्रिभाषा सूत्र' की परिकल्पना की गई थी।
वरिष्ठ पत्रकार
बात सत्तर के दशक की है। मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में एक छोटा सा कस्बा था जावरा- आबादी बामुश्किल 20 हजार, लेकिन वहां के सरकारी स्कूल का विशाल परिसर जो सौ साल का हो रहा था। महात्मा गांधी हायर सेकेंडरी सरकारी स्कूल के प्राचार्य ज्ञान सिंह का सपना था कि बच्चे एक से अधिक भारतीय भाषा सीखें, हालांकि उस समय डीएस कोठारी समिति की त्रिभाषा फॉर्मूले की सिफारिशें असफल हो गई थीं- एक तो संसाधन की कमी थी- दूसरा, हिंदी भाषी राज्यों ने चतुराई से हिंदी-अंग्रेजी और संस्कृत ले कर तीन भाषा की औपचारिकता पूरी कर दी थी।
उस विद्यालय में कक्षा नौ से आगे अनिवार्य था कि हर बच्चा एक भाषा जरूर पढ़ेगा- गुजराती, मराठी, बांग्ला या उर्दू। उर्दू जाफरी साहब पढ़ाते थे और उनकी छड़ी उर्दू की कोमलता के बिल्कुल विपरीत थी। हिंदी वाले जोशी सर एक पीरियड गुजराती का लेते थे, जबकि अंग्रेजी के एसआर मिश्र सर बांग्ला पढ़ाते थे। एक भाषा पढ़ना ही होगा, उसका इम्तेहान भी देना होगा, हां सालाना नतीजे में उसके परिणाम का कोई असर नहीं होता था।
मुझे अवसर मिला कि मैंने वहां एक साल गुजरती और दूसरे साल बांग्ला पढ़ी। न संसाधन की मांग की गई न समय का रोना। मेरे जैसे सैंकड़ों छात्र आज भी उन भाषाओं के कार्य साधक ज्ञान का लाभ पूरे देश में भ्रमण, खासतौर पर बच्चों के साथ काम करने के दौरान उठाते हैं। जहां सरकार का सारा तंत्र असफल हो गया, एक प्राचार्य ने अपनी इच्छा-शक्ति के चलते देश का स्वप्न बन गया ‘त्रिभाषा फार्मूला’ सार्थक किया था। यह उदाहरण है कि कि यदि देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी के पराभव क्षेत्र ईमानदारी से त्रिभाषा पर काम करें, तो इस पर हो रही सियासत को शून्य किया जा सकता है ।
भारत में भाषाई विविधता जितनी समृद्ध है, उतनी ही जटिल भी। इसी जटिलता को सुलझाने और राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोने के लिए 'त्रिभाषा सूत्र' की परिकल्पना की गई थी। भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में त्रिभाषा सूत्र महज एक शैक्षिक नीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सेतु निर्माण का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। इसका इतिहास देश की आजादी के बाद के उन शुरुआती दशकों से जुड़ा है, जब भारत अपनी भाषाई पहचान को संवारने की कोशिश कर रहा था।
आधिकारिक रूप से इसकी जड़ें 1956 के केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के प्रस्तावों में मिलती हैं, जिसे बाद में 1964-66 के कोठारी आयोग ने एक सुव्यवस्थित ढांचे में ढाला। 1968 की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इसे वह वैधानिक आधार दिया, जिसने भारतीय स्कूलों में तीन भाषाओं के अध्ययन को अनिवार्य बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। इस नीति का मूल दर्शन बहुत स्पष्ट था— हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग दक्षिण या अन्य भारतीय भाषाओं को सीखकर भाषाई खाई को पाटें और गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लोग हिंदी के माध्यम से देश के अन्य हिस्सों से जुड़ सकें, जबकि अंग्रेजी वैश्विक ज्ञान और विज्ञान की खिड़की बनी रहे।
त्रिभाषा सूत्र के फायदों की बात करें, तो यह राष्ट्रीय एकीकरण का सबसे सशक्त माध्यम हो सकता है। जब एक उत्तर भारतीय छात्र तमिल या कन्नड़ के माध्यम से उस क्षेत्र के साहित्य और मूल्यों को समझता है, तो क्षेत्रीयता के संकीर्ण दायरे स्वतः ही टूटने लगते हैं। यह न केवल छात्रों के संज्ञानात्मक विकास में सहायक है, बल्कि उनके लिए रोजगार के नए द्वार भी खोलता है। बहुभाषी होना मस्तिष्क के लचीलेपन और समस्या समाधान की क्षमता को बढ़ाता है।
एक छात्र जो अपनी मातृभाषा के साथ-साथ एक अन्य भारतीय भाषा और एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा जानता है, वह आज के वैश्वीकृत युग में अधिक आत्मविश्वासी और समावेशी होता है। नेशनल बुक ट्रस्ट जैसे संस्थानों ने बच्चों की द्विभाषी रंगीन किताबें तैयार कर इस दिशा में काम तो किया है, लेकिन आज जरूरत है कि प्रत्येक हिंदी भाषी राज्य एक गैर-हिंदी भाषी राज्य के भाषा को तीसरी भाषा के रूप में अपनाए।
सन् 1968 में हरियाणा ने पंजाब से अलग हो कर तेलुगु को अपनी दूसरी भाषा बनाया, हालांकि यह राजनीतिक फैसला था, लेकिन उन दिनों हरियाणा में तेलुगु शिक्षकों की नियुक्ति और यहां के शिक्षकों को तेलुगु सीखने के प्रयोग हुए। यह फिर असफल प्रयोग रहा और 2010 में राज्य ने पंजाबी को दूसरी भाषा अधिसूचित किया, दिल्ली में भी जब त्रिभाषा के बात आती है तो यहां उर्दू या पंजाबी आ जाती है।
दुखद है कि इस उदात्त उद्देश्य के बावजूद, पिछले पांच-छह दशकों का इतिहास त्रिभाषा के आंशिक या पूर्ण असफलता की कहानियों से भरा पड़ा है। इसके असफल होने के कारणों की पड़ताल करना आज के समय में अनिवार्य है। सबसे बड़ा कारण रहा है— राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव और भाषाई अस्मिता का टकराव। उत्तर भारत के राज्यों ने इस सूत्र को केवल कागजों पर अपनाया। हिंदी भाषी राज्यों में 'तीसरी भाषा' के रूप में दक्षिण भारतीय भाषाओं को चुनने के बजाय संस्कृत को प्राथमिकता दी गई।
