बिगड़ते-बिखरते रिश्तों का खूनी अंत और समाज की भूमिका

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
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पिछले एक साल में समाज में जिस तरह की घटनाएं हुई हैं, उन्हें यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि परवरिश सही नहीं थी, या फिर यह पाश्चात्य संस्कृति की देन है।

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विवेक सक्सेना, अयोध्या

पिछले एक साल में समाज में जिस तरह की घटनाएं हुई हैं, उन्हें यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि परवरिश सही नहीं थी, या फिर यह पाश्चात्य संस्कृति की देन है। पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मार दिया। किसी ने पिता की हत्या कर दी। राजस्थान की आरुषि पर तो आरोप है कि उसने तो बिना बात के ही अपनी मां को गाड़ी से कुचलवाकर मरवा दिया। अयोध्या में 12 जुलाई को पत्नी ने प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या कर दी। ये घटनाएं बताती हैं कि समस्या कहीं ज्यादा गहरी है। यह घटनाएं केवल अपराध नहीं हैं, समाज के भीतर बढ़ते नैतिक पतन का संकेत हैं। 

देश लंबे समय तक पारिवारिक प्रेम, भाईचारे और संयुक्त परिवारों की संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है। परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं था, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा और सम्मान का आधार माना जाता था। संयुक्त परिवार की खुशियां सामूहिक होती थीं। दुख भी मिलकर सहन किए जाते थे। आज समाज की तस्वीर तेजी से बदल रही है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, बढ़ती भौतिक इच्छाएं उपभोक्तावादी सोच और अवैध संबंधों ने रिश्तों की गंभीरता और आत्मीयता को कमजोर कर दिया है। नतीजन रिश्तों का अंत हिंसा और हत्या तक पहुंच रहा है।

रिश्तों का खूनी अंत (हिंसा या हत्या) अचानक नहीं होता, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से दबे हुए मानसिक और भावनात्मक कारण होते हैं। जब अत्यधिक अहंकार, असुरक्षा, संपत्ति की लालसा और संवादहीनता हावी हो जाती है, तो इंसान का विवेक शून्य हो जाता है, जिससे खूनी संघर्ष की नौबत आती है। आज सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या भौतिकवादी युग में पारिवारिक और खून के रिश्तों के टूटने का सबसे बड़ा कारण अवैध संबंध, संपत्ति, जमीन या पैसों का विवाद है!

देश में कुछ ऐसे चर्चित केस भी हैं, जिनका उदाहरण दिया जा सकता है। फिर चाहे वह नीले ड्रम हत्याकांड वाली मुस्कान रस्तोगी हो, हनीमून पर पति की हत्या करवा देने वाली सोनम रघुवंशी हो, बेंगलुरु के टेक प्रोफेशनल अतुल सुभाष की आत्महत्या हो या फिर इस समय के सबसे चर्चित केसों में से एक केतन अग्रवाल का मामला हो, जिनको उनकी होने वाली पत्नी सिया गोयल ने अपने साथी चेतन चौधरी के साथ मिलकर मौत के घाट उतार दिया। 

अगर हम इन सभी केसों पर नजर डालें, तो इस तरह के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इन घटनाओं के पीछे कोई एक वजह नहीं है। या फिर घटनाओं के पीछे पैसा मुख्य वजह हो। नीले ड्रम वाली मुस्कान के केस में तो उसका पति सौरभ राजपूत लंदन में मर्चेंट नेवी की नौकरी करता था, जबकि प्रेमी कुक था, फिर भी पति की हत्या कर दी। सोनम ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति इंदौर (मध्य प्रदेश) के व्यवसायी राजा रघुवंशी की हनीमून के दौरान हत्या कर दी। इन दोनों केस में पैसे और सुविधाओं की कोई कमी नहीं, लेकिन फिर भी वारदात को अंजाम दिया गया। 

केतन और सिया के मामले में पैसों की कोई कमी नहीं, लेकिन सिया द्वारा पुलिस को दिए गए प्रारंभिक बयान पर गौर करें, तो उसे केतन का विग लगाना व हकलाना पसंद नहीं था। अगर ऐसा था तो शादी के लिए मना कर देती, लेकिन हत्या करना तो किसी भी नजरिये से उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे में सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर इसके पीछे वह कौन सी सोच या स्थिति जिम्मेदार है? 

हम खबर पढ़ते हैं, फिर ‘घोर कलयुग आ गया है’, कहकर एक लंबी आह भरते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या हम एक ऐसी सभ्यता बनते जा रहे हैं, जिसके पास दिमाग तो है, लेकिन दिल, भावनाएं, प्रेम, रिश्तों की गहराई, सम्मान व आत्मीयता नहीं। यहां ये कहना भी गलत नहीं होगा कि वर्तमान में संयुक्त परिवारों का टूटना भी इस समस्या को गंभीर बना रहा है। पहले परिवार में बड़े-बुजुर्ग मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। यदि किसी बात को लेकर विवाद होता था, या कोई गलतमहमी होती थी, कोई गलत रास्ते पर चलता था, तो परिवार के सदस्य बैठकर समझा-बुझाकर, डांट-फटकार कर समाधान निकाल लेते थे। 

आज एकल परिवारों का चलन बढ़ गया है। संवाद भी कम होता जा रहा है। आधुनिक समाज में व्यक्ति की सफलता को उसकी आर्थिक स्थिति से मापा जाने लगा है। बड़ा घर, महंगी गाड़ी और अधिक संपत्ति आज सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुके हैं। सोशल मीडिया और बाजारवादी संस्कृति ने इस सोच को और मजबूत किया है। इस दौड़ में रिश्तों की संवेदनशीलता पीछे छूटती जा रही है। एक वजह ये भी मानी जा सकती है कि पैसे कमाने की होड़ में मां-बाप बच्चों की सही तरीके से परवरिश नहीं कर पा रहे हैं, उनको वो संस्कार नहीं मिल पा रहे जो पुराने समय में घर के बुजुर्ग बाबा-दादी या नाना-नानी देते थे।

यह स्थिति केवल पारिवारिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी है। धन और संपत्ति स्वयं में बुरी चीजें नहीं हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं से ऊपर धन को रख देता है। लालच धीरे-धीरे व्यक्ति की संवेदनशीलता को समाप्त कर देता है। वह रिश्तों को भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक नजरिए से देखने लगता है। जब मनुष्य के भीतर मानवीय मूल्य कमजोर पड़ जाते हैं, तब हिंसा और अपराध के लिए रास्ते खुलने लगते हैं।

समस्या का समाधान केवल कानून से संभव नहीं है। इसके लिए सामाजिक और नैतिक स्तर पर गंभीर प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले परिवारों में संवाद की संस्कृति को मजबूत करना होगा। जब परिवार के सदस्य खुलकर अपनी बात कहेंगे और एक-दूसरे की भावनाओं को समझेंगे, तब विवादों की संभावना कम होगी। कई बार छोटी-छोटी गलतफहमियां संवाद के अभाव में बड़े संघर्षों में बदल जाती हैं। 

बच्चों को बचपन से यह सिखाना होगा कि रिश्ते किसी भी जमीन या धन से अधिक मूल्यवान हैं। शिक्षा व्यवस्था में भी नैतिक शिक्षा और पारिवारिक मूल्यों को अधिक महत्व देने की आवश्यकता है। आज की शिक्षा व्यक्ति को सफल तो बना रही है, लेकिन संवेदनशील नहीं बना पा रही। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि मानवीयता और संबंधों को बचाए रखना भी है।

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