लखनऊ की चिकनकारी का दर्द: दुनिया पहन रही करोड़ों का हुनर, कारीगरों के हिस्से अब भी गरीबी और संघर्ष

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Published By Muskan Dixit
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GI टैग, ग्लोबल पहचान और सेलिब्रिटी फैशन के बावजूद बिचौलियों के जाल में फंसे कारीगर, 36 पारंपरिक टांकों में अब बचे सिर्फ 5-6, मशीनों से बढ़ा असली चिकन पर संकट

लखनऊः नजाकत-नफासत और अदा तमाम रंग बिखेरता हुआ लखनऊ का चिकन अपने आप में ही मुकम्मल है। हर आमों खास को लखनऊ का चिकन लुभाता है। यही वजह कि आज लखनऊ का चिकन दुनियाभर में शान बन चुका है। यहां आने वाला सेलिब्रिटी एक बार पुराने लखनऊ की तंग गलियों में जाकर चिकन जरूर खरीदता है। तमाम नामी-गिरामी परिवारों की शादियों और इंटरनेशनल आवार्ड शो में चिकन जलवा बिखेर रहा है, लेकिन इस चिकन की चकाचौंध वाली रोशनी के बीच एक काला सच यह भी कि इसको चमकाने वाले हुनरमंद अपने घरों में बेबसी और लचारी की जिंदगी बसर कर रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक उंगलियां चलाने के बाद इनके हाथों में बस चंद रुपये ही आते है, जिससे इनका न परिवार चल पा रहा है और न ही पेट भर रहा है। यही वजह कि अब लखनऊ का असली चिकन अपनी पहचान खोता जा रहा है और बाहरी मशीनी चिकन धड़ल्ले से बजारों में उतारा जा रहा है। ऐसा ही हाल रहा तो लखनऊ का चिकन आज जो पूरी दुनिया की शान बना हुआ है, वह किसी म्यूजियम में देखने को मिलेगा।

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लकड़ी पर डिजाइन उकेरने वाले हाथों की कहानी

चिकन की असली शुरुआत होती है लकड़ी के एक उस ठप्पे से जिससे तरह-तरह के डिजाइन उकेरे जाते हैं। जिसे ‘सांचा’ या ‘ब्लॉक’ कहा जाता है। इन सांचों को बनाने वाले कारीगरों को स्थानीय भाषा में ‘भातकार’ कहा जाता है। लखनऊ के मलिहाबाद में एक छोटी सी दुकान में बैठे 54 वर्षीय रमेश कुमार पिछले चार दशकों से यही काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे डिजाइन पूरी दुनिया में नहीं मिलेगे जैसे हम उकेरते हैं। हम रात-रात भर जागकर लकड़ी पर ‘मुर्री’, ‘फंदा’ और ‘कील-कंगन’ के डिजाइन उकेरते हैं। अब बाजार में कंप्यूटर और लेजर कटिंग की मशीनें आ गई हैं। लोग सस्ते के चक्कर में चीनी और मशीन के ठप्पे ला रहे हैं, लेकिन जो सफाई और गहराई हमारे हाथ से तराशे गए शीशम के सांचे में है, वो मशीन कभी नहीं दे सकती। इसके बाद भी हमें हमारी मेहनत का दाम नहीं मिल रहा है। एक सांचे के मुश्किल से सौ से डेढ़ सौ रुपये मिलते हैं। यही वजह कि अब यह काम करने वाले धीरे-धीरे घटते जा रहा है, जहां पहले यहां सैकड़ों लोग यह काम करते थे, अब बस कुछ गिने-चुने लोग ही बचे हैं।

लखनऊ के हजरतगंज की दूधिया रोशनी से नहाए चमचमाते शोरूम। शीशम और कांच के आलीशान काउंटरों पर करीने से सजे चिकन के वो कुर्ते, साड़ियां और लहंगे, जिन्हें देखकर देश-दुनिया से आए रईस और मुसाफिर अपनी जेबें ढीली करने में जरा भी संकोच नहीं करते। शोरूम का सेल्समैन बड़े अदब से मुस्कुराते हुए कपड़े पर हाथ फेरता है और कहता है मैडम, प्योर लखनवी चिकन है, एकदम नफासत और नजाकत का नमूना। दाम सिर्फ 25 हजार रुपये। ग्राहक बिना मोल-तोल किए क्रेडिट कार्ड स्वाइप करता है और मखमली बैग में उस ‘नजाकत’ को समेटकर अपनी महंगी गाड़ी में बैठकर रवाना हो जाता है, लेकिन इस रईसी, इस चमक-दमक और नफासत के इस मुकम्मल जलवे के पीछे का कड़वा सच देखना हो, तो हजरतगंज की चौड़ी सड़कों से निकलकर पुराने लखनऊ के चौक, वजीरगंज, डालीगंज या सआदतगंज की उन बदबूदार, संकरी और घुटन भरी गलियों में जाना होगा, जहां सूरज की रोशनी भी दाखिल होने से पहले सौ बार सोचती है। चिकनकारी सिर्फ सुई और धागे का खेल नहीं है। यह सात अलग-अलग स्तरों से गुजरने वाला एक बेहद पेचीदा और थका देने वाला सफर है। इस सफर में जितने हाथ लगते हैं, उतने ही दर्द और उतने ही शोषण की कहानियां इस कपड़े के एक-एक टांके में दफन हो जाती हैं। आइए, आज लखनऊ की इस ऐतिहासिक विरासत की परत-दर-परत पड़ताल करते हैं और मिलते हैं, उन किरदारों से जिनसे लखनवी चिकन की पहचान है, लेकिन उनकी अपनी पहचान बस उनको इस हुनर के बदले मिलने वाले चंद सिक्के हैं, जो वह बामुश्किल दिन-रात मेहनत करके कमाते हैं।

सरकारी हौदे मिलें तो निखरे चिकन

महिलाएं जब कढ़ाई पूरी कर लेती हैं, तो वह कपड़ा बिल्कुल मैला, पसीने की गंध और नील के दागों से भरा होता है। उसे बाजार में बेचने लायक बनाने का जिम्मा गोमती नदी के किनारों पर या फैक्ट्रियों में काम करने वाले धोबियों का होता है। हुसैनाबाद के पास घाट पर दोपहर की चिलचिलाती धूप में 48 वर्षीय इमरान धोबी चिकन के भारी कपड़ों को लकड़ी के पट्टे पर पटक-पटक कर धो रहे हैं। उन्होंने बताया कि चिकन के कपड़ों की धुलाई कोई आम धुलाई नहीं है। इस कपड़े को साफ करने के लिए हमें भट्टी सुलगानी पड़ती है। सीप के पाउडर, रीठे और ब्लीच के साथ इन कपड़ों को घंटों उबाला जाता है। उसके बाद ठंडे पानी में निकालकर इन्हें लकड़ी के थाप से कूटा जाता है ताकि कढ़ाई के टांके अपनी सही जगह पर बैठ जाएं और धागा पक्का हो जाए। हम भले चिकन को संवारने का काम करते हैं, लेकिन सरकार हम लोगों पर ध्यान नहीं देती है। हम लोग चाहते हैं कि सरकार हमें सरकारी हौदे बनाकर दे दे, तो हमारा काम आसान हो जाएगा। उन्होंने बताया कि अभी हम जमीन में गड्ढ़ा खोदकर, उसमें कपड़े धोने का काम करते हैं।

कड़क स्टार्च और फिनिशिंग का जादू

धुलाई के बाद कपड़ा पूरी तरह सिकुड़ जाता है। इसे वापस अपनी सही शेप में लाने और कड़क बनाने का काम चरकगर करते हैं। चरक यानी स्टार्च या मांड लगाना और फिर उसे भारी-भरकम कोयले वाली प्रेस से सीधा करना। चौक के एक छोटे से केबिन में काम करने वाले 36 वर्षीय अकरम बताते हैं चिकन के कपड़े पर सामान्य प्रेस नहीं चलती। हमें रोलर प्रेस या भारी कोयले वाली इस्त्री का इस्तेमाल करना पड़ता है। कपड़े को एक बड़े लकड़ी के फ्रेम पर कसकर बांधा जाता है, जिसे अखाड़ा कहते हैं। फिर उस पर स्टार्च छिड़क कर फिनिशिंग दी जाती है। जरा सी लापरवाही से अगर कपड़ा जल गया, तो पूरे सूट के पैसे हमारी जेब से जाते हैं। हमें एक पीस की फिनिशिंग के 5 से 10 रुपये मिलते हैं। 

लखनऊ के शोरुम में धूल खा रहा है चिकन

अमीनाबाद में चिकन के शोरुम मालिक ने बताया कि असली चिकन का काम धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है। इसकी जगह नकली चिकन ने ले ली है, जिसकी वजह से व्यापार को भारी नुकसान हो रहा है। हमें एक सिंपल चिकन के पीस को बनवाने में पांच सौ हजार रुपए का खर्चा आता है, जबकि नकली चिकन इतनी रुपए में कस्टमर के हाथ में सीधे पहुंच रहा है। यही वजह कि लोग असली चिकन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। कपड़ा हमारा होता है, धागा हमारा होता है, डिजाइन हम तय करते हैं। शोरूम का लाखों रुपया किराया है, हर महीने बिजली का बिल आता है, स्टाफ की सैलरी है और सबसे बड़ी बात, यह माल तुरंत नहीं बिकता। कभी-कभी एक डिजाइनर लहंगा छह-छह महीने शोरूम में टंगा रहता है। हमारा पैसा डंप रहता है। हम कारीगरों को उनके काम के हिसाब से तुरंत कैश पैसा दे देते हैं। 

बिचौलिए खा जाते हैं मेहनत का पैसा

इस पूरी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी त्रासदी हैं ठेकेदार या बिचौलिए। ये वो लोग होते हैं, जो सीधे शोरूम के मालिकों से थोक में ऑर्डर उठाते हैं। चूंकि रजिया बेगम या रमेश कुमार जैसे कारीगरों की सीधे बड़े शोरूम्स तक पहुंच नहीं होती, इसलिए ये बिचौलिए बीच में आकर मलाई खाते हैं। सरकार ने चिकनकारी को बढ़ावा देने के लिए जीआई टैग भी दिया है। कागजों पर ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ जैसी कई बड़ी और लुभावनी योजनाएं चल रही हैं। कारीगरों को लोन देने, सीधे बाजार उपलब्ध कराने के वादे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पुराने लखनऊ की तंग गलियों में पहुंचने से पहले ही ये योजनाएं दम तोड़ देती हैं। अवध के जिस जायके, लिबास और तहजीब पर पूरा लखनऊ इतराता है, उसकी चमक को दुनियाभर में जिंदा रखने वाली ये उंगलियां इतनी बेरंग और लाचार क्यों हैं? बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय डिजाइनर इन महिलाओं के बनाए हुनर को दिल्ली और मुंबई के ‘लक्जरी फैशन वीक’ में रैंप पर ले जाकर लाखों-करोड़ों रुपये कमा रहे हैं। लखनवी चिकनकारी आज सात समंदर पार भारत का नाम रोशन कर रही है, लेकिन इन चिकन को चमकाने वाली उंगलियों को उनका जायज हक, उनकी सही मजदूरी नहीं मिल रही है। यही वजह है कि आज लखनवी असली चिकन अपनी रंगत खोता जा रहा है और बजार में धड़ल्ले से मशीनरी चिकन बेचा जा रहा है।

नीले हाथ, मामूली कमाई

लकड़ी का सांचा जब बनकर तैयार हो जाता है, तब बारी आती है थान के थान कपड़ों पर डिजाइन उतारने की। इसे ‘छपाई’ या ‘छपैया’ कहा जाता है। सआदतगंज के एक टूटे हुए कारखाने में 30 वर्षीय मोहम्मद आरिफ नील और गोंद के गाढ़े मिक्चर में लकड़ी के ठप्पे को डुबोते हैं और पूरी ताकत से कपड़े पर थाप मारते हैं। खट-खट की यह आवाज इस कारखाने की पहचान है। आरिफ के हाथ कोहनी तक नीले हो चुके हैं, उन्होंने बताया कि दिनभर में सैकड़ों मीटर कपड़े पर झुककर थाप मारनी पड़ती है। शाम तक कलाई सुन्न हो जाती है और फेफड़ों में नील की महक बस जाती है। एक थान छापने के हमें 30 से 40 रुपये मिलते हैं। दिन भर में 400-500 रुपये कमा लेते हैं, लेकिन इस धूल और केमिकल के बीच काम करने से फेफड़े जवाब दे रहे हैं। हमने पढ़ाई लिखाई नहीं कि तो यह कर रहे, लेकिन बच्चों को इस काम में नहीं लगाएगें उनको पढ़ा लिखाकर अफसर बनाएगें।

सुई-धागे से जादू और  जिंदगी का अंधेरा

छपाई के बाद कपड़ा उन उंगलियों के पास जाता है, जिन्हें इस पूरी इंडस्ट्री की असली रूह कहा जाता है यानी पुराने लखनऊ के घरों में बैठी महिला कारीगर। वजीरगंज की एक तंग गलियों में चिकन का काम करने वाली रजियाबेगम ने बताया कि एक कुर्ते पर ‘उलटी बखिया’ और ‘जाली’ का बारीक काम करने में मुझे और मेरी बड़ी बेटी को 10 दिन लगते हैं। इसके बदले हमें 250 रुपये मिले हैं। शोरूम में इसी कुर्ते को कीमत हजारों में है। वहीं फैजुल्लागंज की रहने वाली कहकशां ने बताया कि वह सेवा चिकन सेंटर में काम करती हैं, उन्हें तीन हजार रुपए महीना मिलता है। पैसा बढ़ाने को कहा तो निकाल दिया। अब वह अपना घर में लाकर चिकन का काम करती हैं, लेकिन 25 रुपये रोज से ज्यादा का काम नहीं हो पाता है। मुसाहिब गंज की आफरीन ने बताया कि उनकी भाभी-अम्मी सभी लोग चिकन का काम करते हैं। पापा बढ़ई का काम करते हैं, उनकी कमाई से गुजारा नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से हम उनकी मदद के लिए घर पर ही यह काम करते हैं, लेकिन हम तीनों लोग मिलकर भी एक चार से पांच सौ का कुर्ता हफ्ते भर में नहीं बना पाते हैं। 

इंटरनेशनल ब्रांड्स कर रहे हैं शोषण 

आज देश के बड़े-बड़े डिजाइनर्स और विदेश के लग्जरी ब्रांड्स अपने रेंप शो और शादियों के करोड़ों के लहंगों में इस चिकनकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये ब्रांड्स विदेशों में एक-एक चिकन का जोड़ा 5 लाख से 10 लाख में बेचते हैं और अपनी वेबसाइट पर ‘सस्टेनेबल फैशन और कारीगरों की मदद का ठप्पा लगाते हैं, लेकिन जब यही ऑर्डर पुराने लखनऊ के ठेकेदारों के जरिए इन औरतों तक पहुंचता है, तो उनके हिस्से में 500 रुपये भी नहीं आते।

36 से 4-5 तक सिमट गए चिकन के टांके 

चिकनकारी की असली जान इसके पारंपरिक टांके हैं। शुरुआती दौर में लखनवी चिकनकारी में कुल 36 प्रकार के टांके हुआ करते थे। हर टांके का अपना एक मिजाज और अपनी एक बनावट होती थी। इन 36 टांकों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जाता था उभरे हुए टांके जैसे मुर्री चावल के दाने जैसी कढ़ाई और फंदा बाजरे के दाने जैसी।

सपाट टांके जैसे ताली, कंगन, पेचनी और बखिया कपड़े के उल्टी तरफ से की जाने वाली कढ़ाई, जो सीधी तरफ शैडो इफेक्ट देती है। जालीदार काम, जिसमें कपड़े के धागों को बिना काटे, सुई से अलग करके बेहद महीन और पारदर्शी जाली बनाई जाती है। चिकन के लिए पद्म श्री पा चुकी नसीम बानों बतााती हैं कि आज उन 36 टांकों में से मुश्किल से 5 या 6 टांके ही बाजार में जिंदा बचे हैं। आज का ज्यादातर काम महज बखिया, फंदा, तेपची, जाली और मुर्री तक सिमटकर रह गया है। बाकी के 30 टांके जैसे कील, कंगन, बलदा, धनिया पट्टी, मखमली, सिधौर, घसपट्टी, बनारसी टांके लगभग खत्म हो गए हैं। इन टांकों को जानने वाले उंगलियों पर गिनने लायक बुजुर्ग ही बचे हैं। बाजार में अब किसी के पास सब्र नहीं है। 36 टांकों वाला एक शुद्ध पारंपरिक कुर्ता बनने में 3 से 6 महीने का समय लगता है। ठेकेदार और शोरूम मालिक कारीगर को उतना वक्त और उतनी मजदूरी देने को तैयार नहीं हैं। उन्हें हर हफ्ते नया स्टॉक चाहिए। नतीजा यह हुआ कि कारीगरों ने भी मेहनत और समय बचाने के लिए उन मुश्किल टांकों को बनाना छोड़ दिया, जो ज्यादा वक्त लेते थे। अब सिर्फ वही टांके चलाए जा रहे हैं, जो जल्दी बनते हैं और दूर से देखने में भारी लगते हैं।

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बदलते दौर में खोता जा रहा है असली चिकन

चिकनकारी का इतिहास मुगल काल विशेषकर नूरजहां के दौर से जुड़ा है, लेकिन तब के चिकन और आज के चिकन में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। पहले चिकनकारी सिर्फ सफेद मलमल या सूती कपड़ों पर सफेद सूती धागे से ही की जाती थी। उसे ही असली ‘नफासत’ माना जाता था, लेकिन आज बाजार की मांग और कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ ने इसका स्वरूप बदल दिया है। आज मलमल की जगह जॉर्जेट, शिफॉन, सिल्क और क्रेप जैसे सिंथेटिक कपड़ों ने ले ली है। सफेद धागे की जगह रंग-बिरंगे रेशमी और सिंथेटिक धागों का इस्तेमाल होने लगा है। इतना ही नहीं, कढ़ाई को भारी लुक देने के लिए अब उसमें जरी, गोटा-पत्ती, मुकेश और मोतियों का घालमेल कर दिया गया है, जिसकी चकाचौंध में चिकन कहीं खोता जा रहा है। 

चिकनकारी को मिला चुका है जीआई टैग

लखनऊ की चिकनकारी को साल 2008 में ही जीआई टैग मिल चुका है। इसका कानूनी मतलब यह है कि लखनऊ और इसके आस-पास के तय जिलों के बाहर बने चिकन के कपड़े को ‘लखनवी चिकन’ कहकर नहीं बेचा जा सकता। बाहर के मशीनी चिकन को लखनवी चिकन लिखना या बेचना अपराध है, इसके बावजूद लखनऊ के बजारों में नकली माल सरेआम लखनवी चिकन के नाम पर बेचा जा रहा है।

ऐसे पहचाने, असली और नकली लखनवी चिकन 

कपड़े को उल्टा करें। अगर पीछे धागों की गांठें, उलझे हुए धागे और उबड़-खाबड़ टांके दिखें, तो वह असली है। अगर पीछे का हिस्सा भी बिल्कुल साफ, सपाट और परफेक्ट दिखे, तो वह मशीनी है। असली हाथ के चिकन में ‘मुर्री’ और ‘फंदा’ जैसे टांके कपड़े पर चावल या बाजरे के दाने की तरह उभरे हुए महसूस होते हैं। मशीनी चिकन बिल्कुल सपाट होता है, छूने पर उभार गायब रहता है। असली चिकन में कपड़े के धागों को बिना काटे, सुई से अलग करके जाली बनाई जाती है। नकली मशीनी चिकन में कपड़े को लेजर से काटकर या छेद करके गोल जाली बनाई जाती है, जो एकदम परफेक्ट और खोखली दिखती है। असली चिकन पर कढ़ाई के नीचे या कोनों पर हल्के नीले रंग के छपाई के निशान दिख जाते हैं, जो धोने पर छूटते हैं। मशीन वाले चिकन में ऐसे कोई निशान नहीं होते। हाथ का काम कभी एकदम परफेक्ट नहीं हो सकता, उसमें इंसानी कमियां और धागों की गांठें साफ दिखेंगी। वही उसकी असली पहचान है।

अंबानी से हॉलीवुड तक लखनवी चिकन का जलवा

करोड़पतियों और सेलिब्रिटीज की शादियों व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर लखनवी चिकनकारी हमेशा शान और प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। भारत की सबसे चर्चित शादियों में से एक, ईशा अंबानी की शादी में उन्होंने मशहूर डिजाइनर अबू जानी-संदीप खोसला द्वारा तैयार किया गया विशेष लखनवी चिकनकारी लहंगा पहना, जिस पर हाथ की बारीक कढ़ाई, मूकैश और जरी का काम था। इसे तैयार करने में लखनऊ के कारीगरों को कई महीने लगे और यह लहंगा देश-विदेश की मीडिया में खूब चर्चित रहा।

हाल ही में अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की भव्य शादी में भी लखनवी चिकनकारी का जलवा देखने को मिला। राधिका मर्चेंट से लेकर नीता अंबानी तक ने प्री-वेडिंग और मुख्य समारोहों में चिकनकारी व मूकैश के काम वाले विशेष परिधान पहने, जिनकी कढ़ाई पुराने लखनऊ के कारीगरों ने की थी।

साल 2018 में सोनम कपूर ने अपनी मेहंदी और संगीत समारोह के लिए ऑफ-व्हाइट लखनवी चिकनकारी लहंगा चुना। इस पर महीन कढ़ाई पूरी करने में चुनिंदा कारीगरों को लगभग दो वर्ष लगे थे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लखनवी चिकनकारी ने भारत की पहचान मजबूत की है। साल 2012 में ऐश्वर्या राय बच्चन ने कान्स फिल्म फेस्टिवल के रेड कार्पेट पर सफेद-सुनहरी लखनवी चिकनकारी साड़ी पहनकर वैश्विक मीडिया का ध्यान आकर्षित किया। वहीं पॉप स्टार बियॉन्से ने कोल्डप्ले के चर्चित म्यूजिक वीडियो में लखनवी चिकनकारी पर आधारित परिधान पहना। अप्रैल 2023 में गीगी हदीद ने नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र के उद्घाटन समारोह में सफेद-सुनहरे रंग की लखनवी चिकनकारी पोशाक पहनकर इस भारतीय हस्तकला को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई।

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अंधेरे में उम्मीद की किरण पद्मश्री नसीम बानो का संघर्ष 

ऐसा नहीं है कि इस घुटन भरे माहौल में सबने घुटने टेक दिए हैं। इसी चौक की गलियों से एक ऐसी आवाज भी निकली, जिसने इस हुनर की तकदीर और तस्वीर दोनों को बदलने की जिद ठानी। हम बात कर रहे हैं पद्मश्री नसीमा बानो की। नसीमा बानो सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि लखनऊ की हजारों महिला चिकन कारीगरों के लिए एक आंदोलन का नाम है।

एक बेहद रूढ़िवादी माहौल से निकलकर, जहां औरतों का घर से बाहर निकलना भी गुनाह माना जाता था, नसीमा बानो ने सुई-धागे को अपनी ताकत बनाया। उन्होंने ठेकेदारों और बिचौलियों के उस क्रूर चक्रव्यूह को सीधे चुनौती दी, जो औरतों की मेहनत कौड़ियों के भाव खरीदते थे। उन्होंने महिलाओं को एकजुट किया, उन्हें सीधे बाजार से जोड़ा और कढ़ाई की बारीकियों को सिखाकर उन्हें उनके काम का सही दाम दिलवाया। उनके इसी बेमिसाल योगदान और चिकनकारी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक नई पहचान दिलाने के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा। आज भी नसीमा बानो नई पीढ़ी की लड़कियों के लिए एक ढाल बनकर खड़ी हैं। उनका मानना है कि हुनर किसी की जागीर नहीं है और न ही यह लाचारी का नाम है। अगर औरतें अपनी उंगलियों का मोल समझना शुरू कर दें और बिचौलियों के आगे झुकना बंद कर दें, तो किसी शोरूम मालिक की मजाल नहीं कि वो कलाकारों का शोषण कर सके। हमें अपनी विरासत को बचाना भी है और अपनी अगली पीढ़ी को उसका हक दिलाना भी है। उन्होंने बताया कि हम कलाकार लोग हैं हमारी कला को सरकार ने समझा और सराहा यह अच्छी बात है, लेकिन हम कलाकारों को आम लोगों से अलग करने के लिए सरकार को हमें सहूलियतें भी देनी चाहिए। हम कलाकार होते हुए भी बसों और अस्पतालों में धक्के खाते हैं। अगर सरकार हम कलाकारों का इलाज फ्री कर दे, तो हम कलाकारों का मान और बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि जिस तरह का सब्र इस कला को सीखने और करने के लिए चाहिए मौजूदा समय की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी में वह सब्र नहीं बचा है। यही वजह कि लखनऊ का चिकन धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है। अगर समय रहते युवाओं को इस कला के लिए प्रेरित नहीं किया गया, तो लखनवी चिकन की जगह मशीनरी चिकन बहुत जल्दी ले लेगा अैर लखनवी चिकन सिर्फ म्यूजिम की शान बनकर रह जाएगा।

-दरख्शां कदीर सिद्दीकी, लखनऊ, अमृत विचार लोक दर्पण

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