रणनीतिक विश्वास की मुहर है ‘बिंतांग आदिपूर्णा’
शिक्षाविद
कूटनीति की असली ताकत हाथ मिलाने, औपचारिक स्वागत या साझा तस्वीरों में नहीं, बल्कि उस विश्वास में दिखाई देती है, जिसे कोई राष्ट्र अपने सर्वोच्च सम्मान के जरिए सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता है। जकार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इंडोनेशिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्णा’ से सम्मानित किया जाना ऐसा ही ऐतिहासिक क्षण था। फाइटर जेट्स की सलामी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के आत्मीय स्वागत ने स्पष्ट कर दिया कि भारत-इंडोनेशिया संबंध अब केवल साझा सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं हैं। यह सम्मान दोनों देशों के बीच रणनीतिक विश्वास, साझा भविष्य और क्षेत्रीय जिम्मेदारियों की नई साझेदारी का प्रतीक है। सदियों पुरानी मित्रता अब रक्षा, डिजिटल प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सहयोग जैसे नए आधारों पर कहीं अधिक सशक्त होकर उभर रही है।
‘बिंतांग आदिपूर्णा’ स्वीकार करते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे 140 करोड़ भारतीयों के नाम कर दिया। यही उस सम्मान का सबसे बड़ा अर्थ भी था। स्वतंत्र भारत में जवाहरलाल नेहरू (1995 में मरणोपरांत) के बाद वे दूसरे भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिन्हें यह सम्मान मिला है। वर्ष 1959 में स्थापित यह अलंकरण उन व्यक्तित्वों को दिया जाता है, जिन्होंने इंडोनेशिया की एकता, स्थिरता और समृद्धि में उल्लेखनीय योगदान दिया हो। किसी विदेशी नेता का इससे सम्मानित होना भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा, विश्वसनीय नेतृत्व और दोनों देशों के बीच गहरे होते रणनीतिक विश्वास का प्रमाण है। गणतंत्र दिवस 2025 पर राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की भारत यात्रा के बाद हुआ यह जवाबी दौरा भी स्पष्ट करता है कि भारत-इंडोनेशिया संबंध अब केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि परिणाम देने वाली रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं।
इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि रक्षा सहयोग रही, जिसने भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई रणनीतिक ऊंचाई दी। दोनों देशों के बीच हुए 16 समझौतों में रक्षा क्षेत्र सबसे अहम रहा। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की अतिरिक्त बैटरियों की खरीद, एस्ट्रा बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल से जुड़े समझौते और संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं ने साबित कर दिया कि भारत अब केवल हथियार आयातक नहीं, बल्कि विश्वसनीय रक्षा प्रौद्योगिकी साझेदार बन चुका है।
रणनीतिक दृष्टि से साबांग पोर्ट का संयुक्त विकास इस यात्रा की सबसे दूरगामी उपलब्धियों में है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित यह बंदरगाह वैश्विक समुद्री व्यापार का अहम केंद्र है और ग्रेट निकोबार परियोजना से इसकी निकटता भारत के लिए इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। इससे समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, नौवहन और व्यापारिक लॉजिस्टिक्स में दोनों देशों की क्षमता मजबूत होगी। वहीं, निकल, स्टील और रेयर अर्थ मैग्नेट्स जैसे क्रिटिकल मिनरल्स में निवेश पर सहमति भविष्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक कदम है। दुनिया के सबसे बड़े निकल उत्पादक इंडोनेशिया और ईवी व नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से बढ़ते भारत की यह साझेदारी चीन-निर्भर आपूर्ति श्रृंखला का प्रभावी विकल्प बन सकती है। यही सहयोग ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता की मजबूत बुनियाद भी रखेगा।
मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह साझेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंद-प्रशांत आज रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का प्रमुख केंद्र है। ऐसे दौर में स्वतंत्र, खुला और समृद्ध हिंद-प्रशांत के प्रति भारत और इंडोनेशिया का साझा संकल्प पूरे क्षेत्र को स्थिरता का सकारात्मक संदेश देता है। रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता, आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े समझौते इस दृष्टि को ठोस आधार देते हैं। लगभग 24 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को अधिक संतुलित और व्यापक बनाने की दिशा में भी यह यात्रा महत्वपूर्ण साबित होगी। आर्थिक सहयोग, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने वाले समझौते दोनों देशों को नए अवसरों के साथ एशिया में संतुलित और टिकाऊ विकास की संभावनाओं को भी सुदृढ़ करते हैं।
यह यात्रा केवल एक सफल राजनयिक दौरा नहीं, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और ‘महासागर’ दृष्टि को नई दिशा देने वाला निर्णायक पड़ाव है। रामायण, प्रंबनन मंदिर और साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े ऐतिहासिक रिश्ते अब रक्षा प्रौद्योगिकी, डिजिटल अवसंरचना, समुद्री सहयोग और आर्थिक लचीलेपन की आधुनिक साझेदारी में बदल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने साबित किया कि दूरदर्शी कूटनीति केवल वर्तमान की चुनौतियों का समाधान नहीं करती, बल्कि भविष्य की संभावनाओं की भी मजबूत नींव रखती है। यही साझेदारी दोनों देशों को एशिया ही नहीं, वैश्विक मंच पर भी नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखती है।
