ओक पर संकट वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी
प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी हैं, जो अचानक नहीं आते। ओक (बलूत) वृक्षों के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी, लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है।
जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, तब आमतौर पर ग्लेशियरों के पिघलने, जंगलों की आग, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं, किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं, जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है।
ओक (बलूत) वृक्षों के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी, लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वनों का क्षरण पर्यावरणविदों की चिंता का सबब बना हुआ है।
यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों में इसका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों में इसकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज, खरसू और मोरू प्रमुख हैं। ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और दीर्घ जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला माना जाता है।
ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 2,300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी और सूक्ष्मजीव शामिल हैं। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ कहा जाता है, क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।
इसके अलावा ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहीत कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।
भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुई हैं। ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हजार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण की नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के संयुक्त प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे ‘धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा’ कहा जा रहा है। ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव इस बीमारी को और घातक बना देते हैं।
इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी। इसके अलावा ओक पाउडरी मिल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार और जलवायु परिवर्तन के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हजारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 31 मिलियन टन कार्बन संग्रहीत करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
