उत्तराखंड : बढ़ते भूगर्भीय तनाव से बढ़ रहा है खतरा

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Published By Deepak Mishra
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उत्तराखंड भूकंप की दृष्टि से जोन 4, 5 और 6 में विभाजित है। यहां इंडियन प्लेट निरंतर एशियन प्लेट के भीतर घुस रही है और भूगर्भीय तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है।

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अमित शर्मा, हल्द्वानी

विज्ञान ने भले ही कितनी तरक्की कर ली हो। हम आदिवासी से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआई युग में पहुंच गए हैं, लेकिन प्रकृति से न तो उस समय और न ही आज के समय में हम जीत पाए हैं। बेशक, इतनी प्रगति तो हुई है कि संभावित खतरे की आहट भांपकर समय पूर्व तैयारियां कर उसके जोखिम को कम कर सकते हैं, लेकिन यह ठीक उसी तरह से है, जैसे हम जाने-अनजाने विनाश के कारणों को जन्म देकर उसे पाल पोसकर और समय-समय पर आमंत्रण देकर उससे बचने के उपाय तलाशें। 

हम बात कर रहे हैं भूकंप जैसी आपदा की, जिसने हाल ही में वेनेजुएला में कहर बरपाया है, जहां अब तक 1500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं, तो हजारों लोग अभी भी लापता हैं। तबाही के भयंकर मंजर का इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भूकंप के एक के बाद एक लगे तगड़े झटकों के बाद आई भीषण आपदा में वेनेजुएला का एक शहर तो लगभग पूरी तरह से तबाह हो चुका है।

यहां 7.2 और 7.5 तीव्रता के भूकंप ने तबाही मचाई है। शोध की बात करें तो दुनिया भर में हर साल लगभग पांच लाख भूकंप आते हैं, जिनमें से केवल लगभग 100,000 ही महसूस किए जाते हैं और 100 से नुकसान होता है। वर्ष 2000 से 2025 के बीच 6.0 से 6.9 तीव्रता के बीच औसतन 134 भूकंप आए।

वहीं, वेनेजुएला में आए दो भूकंपों की तरह 7.0 से 7.9 तीव्रता के भूकंपों की संख्या प्रति वर्ष औसतन 14 से कम रही। आठ से अधिक तीव्रता वाले भूकंप तो और भी दुर्लभ हैं। औसतन प्रति वर्ष एक ही भूकंप आता है, हालांकि पिछले कुछ दशकों में कई ऐसे वर्ष भी रहे हैं, जिनमें आठ से अधिक तीव्रता का कोई भूकंप नहीं आया। इतिहास में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप वर्ष 1960 में चिली के बायोबियो में आया था। इस देश में 9.5 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें 1,655 लोग मारे गए थे और 20 लाख लोग बेघर हो गए थे।

अब बात करते हैं उत्तराखंड की। भूकंप की दृष्टि से जोन 4, 5 और 6 में विभाजित इस पर्वतीय राज्य की भूगर्भीय स्थिति कतई स्थिर नहीं है और वर्तमान में बेहद सक्रिय है। इंडियन प्लेट निरंतर एशियन प्लेट के भीतर घुस रही है और भूगर्भीय तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। भूगर्भ वैज्ञानिक मानते है कि उत्तराखंड की धरती पर कभी भी प्रलयकारी भूकंप आ सकता है। भूगर्भीय दृष्टि से हिमालय क्षेत्र पहले से ही बेहद संवेदनशील माना जाता रहा है। हिमालय की भूगर्भीय स्थिति सक्रिय होने के कारण हिमालय ऊपर उठ रहा है, जिसकी ऊंचाई साल दर साल बढ़ रही है।

इस बीच वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) का नया जोन मानचित्र चौंकाने वाला है। नए जोन के मानचित्र के वैज्ञानिक वर्गीकरण में अब उत्तराखंड के कई क्षेत्रों को जोन 6 में शामिल कर दिया गया है, जिस कारण सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि देवभूमि की भूगर्भीय स्थिति अति संवेदनशील हो चुकी है, जिसके चलते वैज्ञानिक चिंतित हैं और चेताते हैं कि अपेक्षित भूकंप और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। लिहाजा भूकंपरोधी भवन निर्माण बचाव का बड़ा उपाय हो सकता है। यहां एक अच्छी रिपोर्ट है कि ऊधमसिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर के बागवाला में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत 1872 आवास भूकंपरोधी बनाए जा रहे हैं, जो भूकंप के निकट भविष्य के खतरे से निपटने के उपाय अपनाने की दिशा में बड़ा कदम बताता है।

नैनीताल स्थित डीएसबी कैंपस की भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. मौलीश्री जोशी बताती हैं कि इंडियन और एशियन प्लेट के बीच टकराव करोड़ों वर्षों से चला आ रहा है और वर्तमान में इन दोनों प्लेटों के घर्षण से बड़ा तनाव उत्पन्न हो रहा है। यह तनाव जब भी रिलीज होता है, तो भूकंप से धरती कांप उठती है। इधर, इंडियन प्लेट एशियन प्लेट के नीचे घुस रही है, जिस कारण इन दोनों प्लेटों के बीच तनाव निरंतर बढ़ रहा है, जिस कारण कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, हालांकि यह कब आएगा, भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। 

डीएसबी कैंपस के पूर्व विभागाध्यक्ष और भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. सीसी पंत की मानें तो नए जोन वर्गीकरण के अनुसार चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर और रुद्रप्रयाग को अति संवेदनशील भूकंप क्षेत्र जोन छह में शामिल किया गया है। ज़ोन पांच में उत्तरकाशी, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चंपावत को शामिल किया गया है। ज़ोन चार क्षेत्र में देहरादून, नैनीताल, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर शामिल किया गया है। मगर 2025 में जारी नए वर्गीकरण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि समूचे उत्तराखंड को जोन छह माना जा सकता है। 

भूगर्भ वैज्ञानिक मानते हैं कि भूकंप से बचाव के लिए भवन निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से होना चाहिए। जिस स्थान पर मकान बना रहे हों, वहां की भूमि ठोस होनी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में ठोस पत्थरों के ऊपर ही भवन बनाने बेहद जरूरी हैं। नदियों के तट से दूरी बेहद जरूरी है। मलबे वाली कच्ची जमीन पर कतई भवन निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में प्राचीन भवन निर्माण तकनीक भूकंपरोधी हुआ करती थी, जिसे आज भी अपनाया जा सकता है और भूकंप से बचा जा सकता है।

अब भूकंप से असली बचाव हमारे ही हाथ में है। यानी मजबूत घर और तैयार दिमाग। हिमालय बनना बंद नहीं होगा, प्लेट टकराना बंद नहीं होंगी। जापान में रोज भूकंप आते हैं, लेकिन लोग मरते नहीं, क्योंकि वहां नियम सख्त हैं और लोग तैयार हैं। डरिए मत, तैयारी कीजिए। एक-एक मजबूत मकान से और एक-एक जागरूक परिवार से, देवभूमि को हम और आप ही बचाएंगे, इसलिए अपना आशियाना हो या व्यापारिक प्रतिष्ठान, एक बार जरूर आकलन कर लें कि वह भूकंप से टक्कर लेने की स्थिति में है या नहीं। 

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