High Court : तलाक-ए-हसन को मान्यता देने से फैमिली कोर्ट नहीं कर सकता इनकार, मुस्लिम वैवाहिक मामलों पर हाईकोर्ट का अहम फैसला
लखनऊ हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध तलाक-ए-हसन पर विवाद न होने की स्थिति में फैमिली कोर्ट तलाकशुदा घोषित करने से इनकार नहीं कर सकता।
लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दिए गए तलाक-ए-हसन को न्यायिक मान्यता देने के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यदि तलाक की वैधता पर दोनों पक्षों में कोई विवाद नहीं है। परिवार न्यायालय प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि तलाक मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार हुआ है, तो वह वैवाहिक स्थिति को तलाकशुदा घोषित करने से इनकार नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में परिवार न्यायालय की भूमिका सिर्फ वैवाहिक स्थिति का सार्वजनिक अभिलेख तैयार करने तक सीमित होती है।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने यह निर्णय एक मुस्लिम पति की ओर से दाखिल प्रथम अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने लखनऊ के परिवार न्यायालय का वह आदेश निरस्त कर दिया, जिसमें तलाक की घोषणा संबंधी वाद यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि तलाक को किसी ने चुनौती नहीं दी है और घोषणा की आवश्यकता स्पष्ट नहीं की गई है।
एक फरवरी 2022 को हुआ था वादकारियों का निकाह
मामले के अनुसार वादकारियों का निकाह एक फरवरी 2022 को हुआ था। कहा गया कि वैवाहिक विवाद के चलते पत्नी सितंबर 2023 से मायके में रहने लगी, सुलह के प्रयास असफल रहने पर शौहर ने दारुल कजा के माध्यम से समझौते की कोशिश की। इसके बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार एक-एक माह के अंतराल पर तीन नोटिस भेजकर तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया पूरी की।
तीनों नोटिस, मेहर और सहमति पर पत्नी की मुहर
पत्नी ने तीनों नोटिस प्राप्त होने, मेहर की एक लाख रुपये की राशि मिलने तथा तलाक पर अपनी सहमति होने की बात लिखित बयान और शपथ पत्र में स्वीकार कर ली थी। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध रूप से किया गया अतिरिक्त न्यायिक (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल) तलाक अपने आप में प्रभावी होता है। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कोई पक्ष तलाक की वैधता को चुनौती देना चाहे तो वह कानून के अनुसार सक्षम अदालत में ऐसा करने के लिए स्वतंत्र होगा।
