प्यार या मनोवैज्ञानिक जाल? जब रिश्ते में भरोसे की जगह शुरू हो जाता है इमोशनल कंट्रोल

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
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सोशल मीडिया से शुरू हुई प्रेम कहानी ने सिखाया बड़ा सबक—जहां सम्मान, भरोसा और संवेदना न हो, वहां प्यार धीरे-धीरे भावनात्मक शोषण में बदल सकता है।

प्रेम सिर्फ दिलों का जुड़ाव नहीं होता-यह दो आत्माओं के बीच संवेदना का पुल होता है। पर जब किसी रिश्ते में एक व्यक्ति धीरे-धीरे दूसरे के मन पर नियंत्रण जमाने लगे, तो प्यार की जगह एक मनोवैज्ञानिक खेल शुरू हो जाता है, जहां भावनाएं हथियार बन जाती हैं और सच्चा प्रेम खो जाता है। आरंभिक आकर्षण का जाल-रश्मि और अभय की मुलाकात सोशल मीडिया पर हुई। बातचीत शुरू हुई, फिर धीरे-धीरे एक गहरा जुड़ाव बनने लगा। अभय ने रश्मि को बताया कि वह बहुत खास है, उसे समझने वाली पहली लड़की है। हर सुबह-सुबह गुड मॉर्निंग के मैसेज के साथ कविता भेजना, हर बात में ध्यान देना-रश्मि को लगा यही सच्चा प्यार है। मगर असल में यह ‘भावनात्मक आकर्षण का प्रारंभिक चरण’ था, जिसमें सामने वाला व्यक्ति अपने मीठे व्यवहार से भरोसा जीत लेता है। यही वह समय होता है, जब दिल जुड़ जाता है और दिमाग पीछे रह जाता है।

धीरे-धीरे नियंत्रण की शुरुआत

समय बीता और अभय का रवैया बदलने लगा। अब उसके सोशल मीडिया कमेंट्स किसी और की पोस्ट पर दिखने लगे। जब रश्मि ने पूछा, तो जवाब मिला - “अरे तुम बेवजह सोचती हो”, “इतना तो नॉर्मल है, बस दोस्ती है।” यह वही क्षण था, जब रिश्ते में ‘भावनात्मक नियंत्रण’ की शुरुआत हुई। जब कोई व्यक्ति आपकी असुविधा को ‘तुम्हारी सोच की समस्या’ कह देता है, तो असल में वह अपनी गलती छिपा रहा होता है। यह प्रक्रिया ‘गैसलाइटिंग’ कहलाती है यानी किसी को उसके ही एहसासों पर शक करवा देना। 

शिकायत पर पलटवार

रश्मि ने कई बार कहा कि उसे बुरा लगता है, जब अभय दूसरी लड़कियों के साथ अत्यधिक फ्रेंडली व्यवहार करता है, लेकिन उसकी हर बात का जवाब पलटवार में मिला- “तुम्हें भरोसा ही नहीं है मुझ पर।” “तुम बहुत डॉमिनेट करती हो।” “मेरा दम घुटता है तुम्हारे साथ।” ऐसे जवाब सुनकर रश्मि सोचने लगी कि शायद गलती उसी की है। असल में यह “blame shifting” यानी दोष को दूसरे पर डालने की प्रक्रिया थी। इससे सामने वाला व्यक्ति अपनी जवाबदेही से बच निकलता है और दूसरे को अपराधबोध में डाल देता है।

सॉरी और फिर वही दोहराव

हर बार झगड़े के बाद अभय ने “सॉरी” कहा, “मुझसे गलती हो गई” लिखा, और कुछ दिनों तक बहुत ध्यान दिया, लेकिन फिर वही पुराना व्यवहार लौट आया-वही कमेंट्स, वही उपेक्षा, वही असंवेदनशीलता। यह रिश्तों में ‘cyclic manipulation’ का सबसे आम पैटर्न है, जहां एक व्यक्ति गलती करता है, माफी मांगता है और फिर वही गलती दोबारा दोहराता है। इससे रिश्ते का दूसरा पक्ष धीरे-धीरे emotionally drain हो जाता है।

आत्मग्लानि और भावनात्मक थकान

कुछ महीनों में रश्मि खुद पर शक करने लगी। उसे लगने लगा कि शायद वह ज्यादा उम्मीद करती है, ज्यादा बोलती है या ज्यादा सोचती है। उसने अपनी भावनाओं को दबाना शुरू कर दिया ताकि झगड़ा न हो। मगर यह दबाव अंदर ही अंदर उसे तोड़ने लगा। वह उस व्यक्ति से दूरी भी नहीं बना पा रही थी, जिसने उसे कमजोर बना दिया था।  इस स्थिति को ‘emotional exhaustion’ कहते हैं, जब व्यक्ति थक जाता है, लेकिन फिर भी रिश्ता छोड़ नहीं पाता, क्योंकि उसने अपने दिल को उस रिश्ते से जोड़ दिया होता है।

प्रेम या स्वार्थ 

अभय कहता था कि वह रश्मि के बिना नहीं रह सकता, मगर जब-जब उसे किसी और से प्रशंसा मिली, वह तुरंत आकर्षित हो गया। यह दिखाता है कि उसका “प्यार” एक ‘ego boost’ था, न कि सच्चा लगाव। ऐसे लोग दूसरों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं ताकि खुद को ‘वांछित’ महसूस कर सकें।

वे अपने हर व्यवहार को ‘नॉर्मल’ कहते हैं, जबकि वही काम जब दूसरा करे, तो उन्हें असहजता होती है।

जब हिलने लगे आत्मसम्मान की नींव

रश्मि ने अंततः महसूस किया कि वह सिर्फ प्यार नहीं खो रही, बल्कि खुद को भी खोती जा रही है। उसकी नींद गायब हो गई थी, आत्मविश्वास कम हो गया था और सबसे बड़ा नुकसान-वह अब खुद पर भरोसा नहीं कर पा रही थी। ऐसे में उसने एक दिन खुद को बचाने के लिए अभय को ब्लॉक कर दिया। वह जानती थी कि यह आसान नहीं होगा, लेकिन यही पहला कदम था अपनी आत्म-गरिमा लौटाने का।

समाज क्या कहता है और ऐसे रिश्तों की सच्चाई क्या है-हमारे समाज में अक्सर यही कहा जाता है-“प्यार में सब चलता है”, “थोड़ा सह लो, रिश्ते निभाने पड़ते हैं।” लेकिन हर समझौता “त्याग” नहीं होता। कई बार यह खुद की भावनाओं का शोषण होता है। रिश्ते तभी खूबसूरत होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को बराबरी से महत्व दें। जहां सम्मान नहीं वहां प्यार भी धीरे-धीरे अपनी गरिमा खो देता है।

अंत में- प्यार अगर आत्मा से जुड़ता है, तो वह ‘संवेदनशील’ होता है, न कि ‘आरोपों से भरा हुआ’। कभी-कभी किसी को अपने जीवन में ब्लॉक करना नफरत नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की रक्षा का प्रतीक होता है। रश्मि जैसी अनगिनत महिलाएं आज इस अनुभव से गुजर चुकी हैं -उन्होंने सच्चे प्यार की उम्मीद में खुद को खोया और फिर अपनी टूटी भावनाओं से खुद को दोबारा गढ़ा। ध्यान रखें, असली रिश्ते वही हैं, जहां प्यार के साथ सम्मान, संवेदना और सुरक्षा  भी महसूस हो। जहां किसी का सॉरी सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि ‘बदलाव की शुरुआत’ हो।

–मेघा राठी, भोपाल... अमृत विचार, लोकदर्पण

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